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कृषि मंत्री के तेवर से भी उलझा हुआ है किसानों का मसला


कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर लाचार है। वह कृषि कानूनों के बारे में वही सब कुछ कहते हैं जो

उन्हें कहने की इजाजत है। बड़ी मुश्किल से इस बार के मंत्रिमंडल पुनर्गठन में उनकी कुर्सी

बच गयी है। लेकिन दिक्कत इस बात की है कि वह अच्छी बात भी जिस लहजे में कह देते

हैं, उससे बनती हुई बात को भी बिगड़ जाने का खतरा अधिक होता है। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह

तोमर ने संसद को बताया कि पिछले साल यानी 2020 से अब तक तीन नए कृषि कानूनों

के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन करने के दौरान करने वाले किसानों का

सरकार के पास कोई रिकॉर्ड नहीं है। शुक्रवार को तोमर ने यह भी कहा कि सरकार ने तीनों

कृषि कानूनों के बारे में किसानों की आशंकाओं का पता लगाने के लिए कोई अध्ययन नहीं

किया है। तीनों कृषि कानूनों के विरोध में मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी

उत्तर प्रदेश के हजारों किसान करीब आठ महीने से दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले हुए

हैं। इनमें से 200 किसानों का एक छोटा समूह, विशेष अनुमति मिलने के बाद अब दिल्ली

के जंतर-मंतर पर धरना दे रहा है। यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार को 2020 के बाद से

कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान मरने वाले किसानों की कुल संख्या के बारे में

पता है, इस पर तोमर ने कहा, भारत सरकार के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है। ऐसा कहकर

उन्होंने निश्चित तौर पर फिर से किसानों को उकसाने का ही काम किया है। इसके पहले

भी कई अवसरों पर दोनों तरफ की नरमी के दौरान उनकी बातों से किसान नेता भड़क गये

थे और बाद बिगड़ गयी थी।

कृषि मंत्री ने राज्यसभा में लिखित उत्तर दिया है

उन्होंने राज्यसभा में एक लिखित जवाब में कहा, ‘केंद्र सरकार ने किसान संगठनों के साथ

विचार-विमर्श के दौरान उनसे अपील की थी कि बच्चों और बुजुर्गों, खासकर महिलाओं को

उस समय की मौजूदा ठंड और कोविड-19 के हालात को देखते हुए उन्हें घर जाने देना

चाहिए।’ इसके अलावा एक अलग जवाब में तोमर ने कहा, इन कृषि कानूनों के कारण

किसानों के मन में पैदा हुई आशंकाओं के कारणों का पता लगाने के लिए कोई अध्ययन

नहीं किया गया है। हालांकि उन्होंने कहा कि केंद्र ने किसानों की आशंकाओं को दूर करने

के लिए काफी सक्रियता दिखाते हुए कोशिश की। किसानों के मुद्दों के प्रति सरकार के

गंभीर और संवेदनशील होने पर जोर देते हुए कृषि मंत्री ने कहा कि केंद्र किसान संगठनों के

साथ सक्रियता से बातचीत में लगा हुआ है। उन्होंने कहा कि मुद्दों को सुलझाने के लिए अब

तक सरकार और आंदोलनकारी किसान संगठनों के बीच 11 दौर की बातचीत हो चुकी है।

सभी दौर की चर्चाओं के दौरान सरकार ने इस बात पर जोर दिया है कि कानूनों को वापस

लिए जाने पर जोर देने के बजाय किसान संगठनों को कानून के विशेष प्रावधानों पर अपने

ऐतराज पर चर्चा करनी चाहिए ताकि उनके मुद्दे का समाधान किया जा सके। उन्होंने कहा,

वार्ता के विभिन्न चरणों के दौरान सरकार ने लगातार किसान संगठनों से कृषि कानूनों के

प्रावधानों पर चर्चा करने का अनुरोध किया ताकि अगर किसी प्रावधान पर आपत्ति हो तो

उनके समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जा सके। लेकिन किसान संगठनों ने केवल कृषि

कानूनों को रद्द करने पर जोर दिया। इस बात को समझने की जरूरत भाजपा को है कि इस

अड़ियल रवैये की वजह से उन्हें क्या कुछ चुनावी नुकसान हो सकता है।

नेताओं को सिर्फ वोट का नफा नुकसान समझ में आता है

दरअसल देश के नेता सिर्फ वोट के नफा नुकसान की बात को ही अच्छी तरह समझते हैं

बाकी बातों से उनका कोई खास लेना देना नहीं होता है। तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने

तथा फसल पर एसएसपी घोषित करने की मांग पर अड़े किसान अब समानांतर संसद

चला रहे हैं। जंतर मंतर पर जारी इस किसान संसद में भी किसानों से जुड़े मुद्दो पर ही

संसद की तर्ज पर बहस हो रही है। समझा जा सकता है कि इस बहाने किसानों को भी

राजनीतिक तौर पर प्रशिक्षित और आने वाले दिनों में नेताओं के उत्तरों पर प्रति प्रश्न

करने की सीख भी दी जा रही है। दिल्ली की सीमा से सटे राज्यो के अनेक इलाकों में अब

भाजपा के जमीनी स्तर के नेता खुलकर गांवों का दौरा नहीं कर पा रहे हैं। जाहिर है कि इस

किस्म के माहौल में चुनावी नुकसान अगर किसी को सबसे अधिक होना है तो वह भाजपा

ही है। इस तनाव पूर्ण माहौल में कृषि मंत्री के तेवर भी आग में घी डालने का काम कर

जाता है, इस बात को या तो कृषि मंत्री खुद समझ नहीं पा रहे हैं अथवा वह इस सरकार में

अपनी औकात समझकर ऐसा कर रहे हैं, जो उनकी मजबूरी भी हो सकती है।

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