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उम्र का असर रोकने की दिशा में वैज्ञानिकों का नया अनुसंधान

  • मक्खी और चूहों पर प्रयोग सफल रहा है

  • डीएन में सुरक्षित आंकड़ों को बदल सकेगा

  • हिस्टोन प्रोटिन से इसका सीधा रिश्ता होता है

  • रापामाइसिन शरीर के डीएनए कोष को बदल सकती है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः उम्र का असर चेहरे और शरीर के अन्य अंगों पर कम पड़े अथवा नहीं पड़े, यह काफी

पुरानी वैज्ञानिक शोध का विषय रहा है। इसके तहत अलग अलग किस्म के अनुसंधान

चलते आ रहे हैं। अब वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि इस काम में पहले से उपयोग में आने

वाली एक दवा रापामाइसिन शरीर के डीएनए कोष में संग्रहित आंकड़ों को बदलने की

क्षमता रखती है। वैसे इसी डीएनए कोष में पूरी शरीर का विस्तृत विवरण अत्यंत संक्षिप्त

अवस्था में होता है। इस कोष में जो वैज्ञानिक संकेत छिपे होते हैं,वे अगर क्रम से सजाया

जाए तो वह एक मीटर लंबे हो सकते हैं। इतने व्यापक स्तर पर आंकड़ों को सुरक्षित रखने

के बीच ही यह दवा खास किस्म के सेलों को बदलने की क्षमता रखती है। इस बदलाव से

स्वास्थ्य में सुधार होता है और इंसान की जीवनचर्या भी बदल जाती है। उम्र का असर इस

दवा से रोकने और डीएनए के अंदर सुरक्षित कोषों में से खास सेलों की स्थिति बदलने का

यह एक अंतर्राष्ट्रीय शोध रहा है। इसमें मैक्स प्लैंक इंस्टिट्यूट फॉर बॉयोलॉजी,

यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोंग, यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के साथ साथ यूनिवर्सिटी ऑफ

मिशिगन ने काम किया है। इस सम्मिलित प्रयास का ही नतीजा है कि दवा के प्रभाव को

अब नापा जा सका है। वैसे इस प्रभाव को इंसानों पर नहीं बल्कि मक्खियों और चूहों पर

आजमाया गया है। परीक्षण के सफल होने की वजह से वैज्ञानिक यह मानते हैं कि

उम्रजनित रोगों के ईलाज में यह परीक्षण नये द्वार खोलने वाला साबित होगा। डीएनए में

सुरक्षित आंकड़ों को दोबारा लिखने की सफलता मिलने के बाद इंसान की उम्रजनित

समस्याओँ का भी निदान कर पाना संभव होगा। बता दें कि हर प्राणी के शरीर में मौजूद

यह सुक्षम हिस्से अत्यंत जटिल और विशाल सूचनाओं का भंडार होते हैं।

उम्र का असर का विवरण यहीं दर्ज होता है

आकार में महज कुछ माइक्रोमीटर के होने के बाद भी उनमें ढेर सारा आंकड़ा सुरक्षित होता

है। इसी वजह से दूसरी शोध इस बात की भी चल रही है कि अब जीवित कोष में ही

कंप्यूटर के आंकड़ों को सुरक्षित किया जाए। इस विधि से आंकड़ों को रखने के लिए कम

स्थान की आवश्यकता होगी। जब तक ऐसे सेल सुरक्षित रहेंगे, उन आंकड़ों को दोबारा

हासिल कर पाना भी बेहद आसान हो जाएगा। लेकिन उम्र का असर रोकने के लिए पहले से

आजमायी गयी दवा को नये सिरे से जांच लेने के बाद उस प्रक्रिया को समझा जा रहा है,

जिसके तहत इंसानों पर भी इसे सही तरीके से आजमाया जा सकता है। इस विधि को

आजमाते हुए वैज्ञानिकों ने डीएनए के उस प्रोटिन पर निशाना साधा है, जिसे हिस्टोन

कहते हैं। इन हिस्टोनों पर चोट लगने से हुए बदलाव ही किस जीन को जिनोम श्रृंखला से

पढ़ा जा सकता है, यह पढ़ने की स्थिति को भी बदल देता है। उम्र का असर होने पर इन

हिस्टोनों में भी परिवर्तन होता चला जाता है। इसी रास्ते से उम्र के प्रभाव को रोकने के

लिए इस कोष में मौजूद आंकड़ों को भी बदला जा सकता है। हाल में इस्तेमाल में आयी

दवा से फिलहाल शरीर के मेटाबॉलिज्म में सुधार का काम किया गया है। यह दवा शरीर

की उर्जा, पौष्टिकता और तनाव की स्थिति में बदलाव कर पाने मे सक्षम है। वह दवा शरीर

के इन सभी उल्लेखित क्रियाओं पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। अब इसी दवा के प्रयोग

से उम्र का असर रोकने पर भी बेहतर परिणाम मिलने की उम्मीद है। मक्खियों पर जब

इसे आजमाया गया तो वैज्ञानिकों ने पाया कि उसके उड़ने और जीवनचर्या में उल्लेखनीय

बदलाव आया है। इस दवा ने सिर्फ उन्हीं टिश्यू पर अपना असर दिखाया था।

इस प्रयोग को मक्खियों और चूहों पर आजमाया गया है

इस दवा से उम्र का असर रोकने के प्रयोग में इसे चूहों पर भी आजमाया गया। जिसके

बेहतर परिणाम निकले। लिहाजा वैज्ञानिक यह मानते हैं कि हिस्टोन प्रोटिन का शरीर की

दैनिक क्रियाओँ पर असर होता है। यह प्रोटिन उम्र बढ़ने के साथ साथ बदलता चला जाता

है। अब अगर प्रोटिन की स्थिति को फिर से पहले जैसा कर दिया जाए तो उम्र का असर भी

रोकने के अलावा शायद पीछे भी ले जाया जा सकता है। लेकिन इसे इंसानों पर आजमाने

के पहले कई अन्य अनुसंधानों के बीच से गुजरना है। ताकि उसके हर पहलु की अच्छे

तरीके से जांच की जा सके।

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