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झारखंड विधानसभा में फिर से समय की बर्बादी

झारखंड विधानसभा में इस बजट सत्र में फिर से समय की बर्बादी हो रही है। जिन मुद्दों पर

विधायी कार्य हो सकता था वह दलगत राजनीति की भेंट चढ़ रहा है। मजेदार स्थिति यह

है कि पूर्व की भाजपा सरकार में जो लोग विरोध करते थे, वे अब सरकार में हैं। दूसरी तरफ

जो भाजपा पहले इन्हीं विरोधियों पर सदन का समय फिजूल की बातों में नष्ट करने का

आरोप लगाती थी, वह आज खुद उन्हीं आरोपों के घेरे में हैं। लेकिन इतना तो तय है कि

जनता के पैसे से संचालित होने वाले इस सदन में जनता के हितों की बात नहीं हो पा रही

है। वर्तमान में झारखंड विधानसभा में जिस मुद्दे पर सबसे अधिक विवाद है, वह नेता

प्रतिपक्ष का है। भाजपा ने अपनी बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को विधायक दल

का नेता चुना है। इस लिहाज से वह भाजपा की तरफ से विपक्ष के नेता हैं। लेकिन सदन के

अंदर श्री मरांडी की पार्टी के विलय को लेकर सवाल है। यह सवाल खुद श्री मरांडी ने पूर्व में

अपने छह विधायकों के भाजपा में चले जाने के दौरान उठाया था। लिहाजा आज यही

सवाल फिर से उनके ऊपर आ खड़ा हुआ है। लेकिन इस मुद्दे के बिना भी अन्य विषयों पर

सार्थक चर्चा नहीं हो पाना, एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। भले ही इसमें किसी एक पक्ष का

दोष नहीं हो और समय का पहिया चलते हुए दोबारा ऐसी स्थिति उत्पन्न करने की वजह

से यह गतिरोध उत्पन्न हुआ हो लेकिन इससे अहित तो अंततः जनता का ही हो रहा है।

झारखंड विधानसभा में पेश हो चुका है इस बार का बजट

बजट सत्र के दौरान सरकार द्वारा पेश किये गये बजट पर सार्थक चर्चा होती तो हो सकता

था कि कुछ और बेहतर सुझाव सदन के माध्यम से सरकार को मिल जाते। इससे झारखंड

राज्य के बजट को और भी लोकोन्मुखी बनाने में मदद मिलती। वर्तमान में झारखंड की

सबसे बड़ी सरकारी चुनौती घाटा को कम करने और झारखंड पर लदे बोझ को कम करना

ही है। जब तक हम आर्थिक तौर पर किसी मजबूत धरातल पर खड़े नहीं होंगे, राज्य का

विकास परिलक्षित नहीं हो पायेगा। साथ ही खनिज संपदा के मामले में झारखंड को

कितना हिस्सा सही में मिल पा रहा है, इस पर नये सिरे से विचार करने की जरूरत है।

कागजी आंकड़ों से अलग हटकर वास्तविक काम की जरूरत

कागजी आंकड़ों में झारखंड की यह आमदनी काफी अधिक होने के बाद भी झारखंड की

महत्वपूर्ण योजनाओं के लिए धन की कमी क्यों हो जाती है, इसे भी बजट के बाद की

प्रक्रिया में और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। जब सरकारें बदलती हैं तो बहुत कुछ

जो अंदरखाने में दबा होता है, वह भी धीरे-धीरे निकलकर बाहर आने लगता है। झारखंड के

साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। पूर्व की रघुवर दास सरकार ने बार बार खुद को बेदाग

सरकार होने का दावा किया था। अब ऐसे ऐसे दस्तावेज निकलकर सामने आ रहे हैं,

जिनपर जांच के बाद ही यह निष्कर्ष निकाला जा सकेगा कि वाकई पुरानी सरकार बेदाग

थी अथवा नहीं। अलबत्ता यह अच्छी बात है कि सरकार के मुखिया हेमंत सोरेन की

सोशल मीडिया पर सक्रियता की वजह से दूर दराज तक की परेशानियों का खुलासा

सार्वजनिक तौर पर हो रहा है। उनमें से अनेक का समाधान भी हो चुका है और आगे भी

होता रहेगा।

सरकार और कैसे बेहतर काम करे इस पर कोई बात नहीं

यह सरकार के काम काज की एक अलग और बेहतर उपलब्धि मानी जा सकती है। लेकिन

झारखंड विधानसभा में अगर सही तरीके से काम काज होता तो निश्चित तौर पर आगे भी

बहुत कुछ अच्छा हो सकता था। विधानसभा में फिर से भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री

रणधीर सिंह अपने आचरण से सबको हैरान कर गये हैं। याद रहे कि इससे पहले भी

उन्होंने प्रमुख समाजशास्त्री और चिंतक ज्यां द्रेज के मामले में कुछ ऐसा ही आचरण

किया था, जिसकी सर्वत्र निंदा हुई थी। इतना तो तय है कि सीएए और एनआरसी के मुद्दे

पर सदन में जब भी चर्चा होगी, दोनों पक्षों का रुख अलग अलग होगा और फिर से दोनों

पक्ष आपस में भिड़ जाएंगे। लेकिन बजट और आर्थिक मुद्दों पर सार्थक चर्चा को बाधित

करने के असली कारण क्या हैं, इसे समझने की जरूरत है। सरकार की फाइलों में जैसे जैसे

पूर्व की सरकार के कारनामों का उल्लेख अनधिकृत तौर पर हो रहा है, वैसे वैसे यह सवाल

महत्वपूर्ण होता जा रहा है कि पिछली सरकार और उस सरकार के प्रियपात्र रहे

अधिकारियों का आखिर क्या होगा। अब तो इन मुद्दों पर भाजपा के मुखर प्रवक्ताओं की

टोली भी सवालों का सटीक उत्तर देने से कतराने लगी है। जाहि है कि इन मुद्दों पर आने

वाले दिनों में पूर्व सरकार के मुखिया रघुवर दास को ही उत्तर देना है। लेकिन झारखंड

विधानसभा का कीमती समय इन बातों में नष्ट हो, यह जनता के हितों के साथ सरासर

नाइंसाफी है।


 

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