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मुंगेर हिंसा की जिम्मेदारी तो चुनाव आयोग पर है

मुंगेर हिंसा बेकाबू होने के बाद जो कुछ फैसला आनन फानन में लिया गया, वह पहले क्यों

नहीं लिया जा सकता था, इस सवाल का उत्तर सिर्फ चुनाव आयोग के पास ही है। कई बार

विरोधी दलों की तरफ से यह आरोप लगते रहे हैं कि चुनाव आयोग कई अवसरों पर

निष्पक्ष तरीके से काम नहीं कर पाता है। मुंगेर हिंसा की घटना भी उसका एक उदाहरण है।

दुर्गापूजा विसर्जन के दौरान युवक की मौत के पहले के घटनाक्रम भी अब सार्वजनिक हो

चुके हैं। कृष्णा प्रसाद नाम का व्यक्ति मोकामा से आकर यहां क्यों लोगों पर डंडा चला रहा

था और उसे ऐसा करने की छूट किसने दी थी, यह सवाल अहम है। लेकिन बड़ा मसला यह

है कि डीएम और एसपी को हटाने के लिए चुनाव आयोग ने मुंगेर हिंसा की घटना तक का

इंतजार ही क्यों किया। जो कुछ हिंसक घटनाओं के बाद किया गया वह सब कुछ पहले

क्यों नहीं हो सकता था, उस सवाल का उत्तर तो सिर्फ चुनाव आयोग के पास है। दुर्गापूजा

विसर्जन में हुई फायरिंग के बाद जब जनता की तरफ से लगातार डीएम और एसपी को

हटाने के लिए आंदोलन हो रहा था तब क्या चुनाव आयोग को उसकी सूचना नहीं थी।

जिसका नतीजा कल निकला जबकि जनता का आक्रोश विस्फोट कर गया। जनता सड़कों

पर आयी और जैसे कि ऐसे अवसरों पर होता है, भीड़ बेकाबू और हिंसा पर उतारू हो गयी।

अचानक हिंसक हुई भीड़ ने कई थानों पर हमला किया है। दुर्गापूजा जुलूस में हुई फायरिंग

में मारे गये युवक अनुराग के हत्यारों को दंड देने की मांग पर जनता न सिर्फ सड़कों पर है

बल्कि विभिन्न चौक चौराहों पर इसके समर्थन में जबर्दस्त नारेबाजी भी चल रही है।

मुंगेर हिंसा के पूर्व जनता कार्रवाई चाहती थी

स्थानीय जनता वहां की एसपी लिपि सिंह की भूमिका को लेकर घटना के दिन से ही

असंतुष्ट थी। इस बीच जनता को उम्मीद थी कि चुनाव आयोग के अधीन सरकार होने की

वजह से चुनाव आयोग के स्तर पर कार्रवाई की जाएगी। दरअसल बिहार के मुख्यमंत्री

नीतीश कुमार के करीबी नेता की पुत्री होने की वजह से भी लिपि सिंह आरोपों से घिरी हुई

थी। इससे पहले जब वह बाढ़ में एएसपी थी, तब भी चुनाव आयोग ने चुनाव के दौरान

उन्हें हटा दिया था। लिहाजा विभागीय अधिकारी भी यह मान रहे थे कि चुनाव आयोग इस

बार भी कुछ वैसा ही फैसला लेगा। प्रचलित परंपरा के मुताबिक चुनाव कार्य से एक बार

अलग किये गये अफसर को हर चुनाव में चुनाव से जुड़े कार्यों से हटा दिया जाता है।

लेकिन इस बार लिपि सिंह के मामले में चुनाव आयोग ने ऐसा कुछ नहीं किया। इसलिए

आयोग को ही अपने इस फैसले का भी जबाव देना पड़ेगा, जिसकी वजह से मुंगेर की

जनता भड़क उठी। मुंगेर के सरायपुर थाने के बाहर में गाड़ी में आग लगाई गई है। अपुष्ट

जानकारी के मुताबिक वहां के पुलिस ऑफिस में भी तोड़फोड़ की सूचना मिल रही है। अब

बाद के घटनाक्रमों पर गौर करें तो हम पाते हैं कि चुनाव आयोग ने घटना की जानकारी

मिलने के बाद एसपी और डीएम को हटा दिया है। बिहार निर्वाचन आयोग ने कड़ी कार्रवाई

करते हुए मुंगेर की एसपी लिपि सिंह और डीएम राजेश मीणा को तत्काल प्रभाव से हटाने

का आदेश जारी किया है। निर्वाचन आयोग ने यह फैसला मुंगेर में लगातार भड़क रही

हिंसा के बाद लिया है। इस घटना के बाद निर्वाचन आयोग ने पूरे मामले की जांच के भी

आदेश दिए हैं। मगध प्रमंडल के आयुक्त घटना की गहनता से जांच करेंगे।

जांच का आदेश विलंब से क्यों जारी किया आयोग ने

निर्वाचन आयोग ने उन्हें 07 दिनों के भीतर जांच प्रतिवेदन समर्पित करने को कहा है।

उनके स्थान पर रचना पाटिल को डीएम तथा मानवजीत सिंह ढिल्लों को वहां के एसपी

बनाया गया है। यह काम पहले क्यों नहीं हो सका, यह सवाल बड़ा अहम है। क्योंकि

चुनावी माहौल में विरोधी दलों द्वारा भी लगातार इन दोनों अधिकारियों के हटाने की मांग

को नजरअंदाज किया जाना भी चुनाव आयोग की भूल है। लिपि सिंह के परिवार की

राजनीतिक पृष्टभूमि से अवगत होने के बाद भी चुनाव आयोग के सामने वह कौन सी

मजबूरी थी, इसे भी आयोग खुद स्पष्ट कर सकता है। दरअसल चुनाव आयोग में

अधिकारियों की पदस्थापना से ही विवाद की स्थिति बनी हुई है। यह आरोप पुराना है कि

चुनाव आयोग में बतौर आयुक्त काम कर रहे कई लोग भाजपा के पक्षधर अफसर के तौर

पर जाने जाते रहे हैं। इसलिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत खुद को तटस्थ बनाने रखने से

ज्यादा जरूरी खुद को तटस्थ दिखाना भी है। इन दोनों मुद्दों पर चुनाव आयोग अपने

आचरण और कार्रवाई से ही जनता के मन में उठ रही शंकाओं का निवारण कर सकता है।


 

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