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असम चुनाव के बाद सारदा और अन्य जांचों का क्या होगा

असम चुनाव के बाद क्या सारदा चिटफंड घोटाले की जांच की गाड़ी आगे बढ़ पायेगी। यह

सवाल इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि बार बार भाजपा के अज्ञात माध्यमों से यह प्रचारित

किया जा रहा है कि असम में भाजपा जीती तो इस बार मुख्यमंत्री का चेहरा बदलेगा।

अगर वाकई असम में मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने की बात आयी तो निश्चित तौर पर

हिमंत बिस्वा सरमा का चेहरा ही सामने आता है। लेकिन असम में भाजपा के उदय के

पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जो परिश्रम है, उसी ने सर्वानंद सोनोवाल के असम का

मुख्यमंत्री बनाया था। उस दौरान आरएसएस की तरफ से राम माधव यह भूमिका निभा

रहे थे। वर्तमान में राम माधव कतार में पीछे जा चुके हैं। इस राज्य का फैसला अब उनके

हाथ से निकलकर सीधे अमित शाह के पास चला गया है। इसलिए असम चुनाव संपन्न

होने के बाद आखिर क्या होगा यह भाजपा के लिए भी सवाल है। लेकिन सारदा और अन्य

जांचों का उल्लेख अभी से ही होना अपने आप में महत्वपूर्ण है। याद दिला दें कि सारडा

घोटाले की प्रारंभिक जांच के दौर मे हिमंत बिस्वा सरमा का नाम इसमें आया था। इसी

तरह भाजपा के पश्चिम बंगाल के चुनावी रणनीतिकार मुकुल राय का नाम भी इसमें

उछला था। फिलहाल दोनों ही भाजपा के बड़े नेता हैं। वैसे हिमंत बिस्वा सरमा की जब जब

चर्चा होती है तो भाजपा में उनके विरोधी इस बात का भी उल्लेख कर देते हैं कि लुई बर्गर

नामक अमेरिकी कंपनी ने अमेरिका की एक अदालत में यह स्वीकार किया कि उसने

दुनिया भर में परियोजनाएं हासिल करने के लिए सरकारों और राजनेताओं को रिश्वत दी

है। कंपनी ने कहा कि उसने भारत के गोवा और असम में जल विकास परियोजनाएं

हासिल करने के लिए 2010 में अधिकारियों को रिश्वत दी है।

सारदा कांड में पहले से ही हिमंत बिस्वा सरमा का नाम आया था

यह वह समय था जब हिमंत विश्व शर्मा राज्य में संबंधित मंत्रालय संभाल रहे थे। गोवा में

चचिल अलेमाओ को गिरफ्तार किया गया। असम में किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया

और फाइल गुम हो गई। कुछ इसी तरह बिहार के चर्चित सृजन घोटाले का भी हाल होता

दिख रहा है, जिसमें सीबीआई जांच रही है। अब असम भाजपा के इन दोनों चेहरों का

राजनीतिक इतिहास भी समझ लें। युवावस्था में सोनोवाल ने राजनीति में प्रवेश के साथ

ही पहचान की राजनीति को अपना लिया था और वह सन 1992 में ऑल असम स्टूडेंट्स

यूनियन (आसू) के अध्यक्ष बन गए थे। वह सन 1999 तक इस पद पर बने रहे। इसके बाद

उन्होंने अगला कदम उठाया और 2001 में असम गण परिषद (अगप) में शामिल हो गए।

उसी वर्ष वह विधायक भी बन गए। आसू और अगप की राजनीति असम की जमीन से

जुडऩे की राजनीति थी। सोनोवाल ने इसे परिष्कृत किया और इसका विस्तार करते हुए

आदिवासी छात्र समूहों को असमिया पहचान में शामिल किया ताकि असम की स्थानीय

पहचान का दबदबा कायम हो सके। कोशिश यह थी कि कांग्रेस की उस दलील का

मुकाबला किया जा सके जिसके मुताबिक अली (मुस्लिम), कुली (चाय बागान कर्मी) और

बंगाली (बंगाली हिंदू जो प्राय: क्लर्क थे, और छोटे मोटे कारोबारी जो बांग्लादेश के निर्माण

के समय असम आए थे) जब तक कांग्रेस के साथ हैं, उसे हराया नहीं जा सकता। समय के

साथ असम गण परिषद में राजनीतिक जंग लगता चला गया है और यह कह सकते हैं कि

अगप एक डूबता जहाज था और नेतृत्व के कई हिस्सों में बंटा होने के कारण सोनोवाल ने

बतौर पेशेवर राजनेता अपने समक्ष मौजूदा इकलौता विकल्प चुना और वह भाजपा में

शामिल हो गए।

असम चुनाव के बाद जांच पर जनता की नजर रहेगी

इसके बाद अगप में उनके साथ रहे कई नेता भाजपा में आ गए। सोनोवाल को नरेंद्र मोदी

सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया। राज्य विधानसभा चुनाव के एक वर्ष पहले 2015 में

उन्हें दोबारा असम भाजपा का अध्यक्ष बना दिया गया। इस समय उन्हें एक हल्का झटका

लगा। भाजपा नेतृत्व ने अपनी समझदारी में कांग्रेस से हिमंत विश्व शर्मा को पार्टी में लाने

का निर्णय किया। जनवरी 2016 में सोनोवाल को भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री का

प्रत्याशी घोषित किया गया। यह पुरानी परंपरा से विचलन था। चुनाव में पार्टी को 45

प्रतिशत मत मिले। इस बार पार्टी यह नहीं बता रही है कि अगर वह सत्ता में आई तो

मुख्यमंत्री कौन होगा। चुनाव से पहले हिमंत बिस्वा सरमा के बारे में यह कहा गया था कि

वह चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं थे। लेकिन उन्हें यह कहकर मनाया गया कि सर्वानंद को

मुख्यमंत्री का चेहरा बताकर चुनाव नहीं लड़ा जाएगा। इसके बाद ही वह चुनावी मैदान में

सक्रिय हुए। अब असम चुनाव के बाद उन जांचों का क्या होगा, जिन्हें बंगाल के चुनाव में

खुद भाजपा के ममता बनर्जी के खिलाफ बतौर हथियार आजमाया है।

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