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जासूसी स्पाईवायर को करीब साठ करोड़ का भुगतान किसने किया

  • सरकार के किया जानकारी होने का स्पष्ट खंडन
  • मूल कंपनी को अब तक कोई नोटिस क्यों नहीं का सवाल
  • विशेषज्ञों ने कहा केंद्र सरकार की इस बात की जानकारी
  • अमेरिका की अदालत में इस बारे में साक्ष्य दाखिल
विशेष प्रतिनिधि

नईदिल्लीः जासूसी स्पाईवायर के भारत में इस्तेमाल होने पर अब कोई

सफाई नहीं है। यह स्पष्ट हो चुका है कि इस बारे में जो चर्चा हो रही है,

वह सच है। अमेरिकी अदालत में इस बारे में मामला दर्ज हो चुका है। उसमें

कई साक्ष्य दाखिल भी कर दिये गये हैं जो खास भारतीय लोगों के खिलाफ

जासूसी किये जाने की बात कहते हैं। दूसरी तरफ इस किस्म की जासूसी के

तौर तरीकों को जानने के बाद अनेक लोग यह स्वीकार कर रहे हैं कि वे

भी इस दौर से गुजर चुके हैं।

साइबर विशेषज्ञों ने स्पष्ट कर दिया है कि यह कोई सस्ता और बाजार में

नकली तौर पर बिकने वाला साफ्टवेयर नहीं है। इसलिए अगर कंपनी ने

यह काम किया है तो स्पाईवायर की कीमत भारतीय मुद्रा में करीब 54

करोड़ रुपये हैं। इसके अलावा अन्य इंतजाम मिलाकर कंपनी को करीब

साठ करोड़ रुपये का भुगतान कमसे कम किया गया होगा।

यह भुगतान किसने किया है, यह भारत में अगर पता नहीं चला तो

अमेरिकी अदालत में चल रहे मुकदमे में इसका खुलासा हो सकता है।

इस बीच भारतीय गृह मंत्रालय ने अपनी तरफ से स्पष्ट किया है कि

उसकी तरफ से ऐसा कुछ भी नहीं किया गया है। सरकार ने यह भी

स्पष्ट किया है कि उसने न तो यह स्पाईवेयर खऱीदा है और न ही

भविष्य में इसे खऱीदने की कोई योजना भी है।

इस बीच केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के बयान के बाद पहली बार व्हाट्सएप

ने भी उसपर अपनी राय जाहिर की है। फेसबुक के नियंत्रण वाले इस सोशल

मीडिया प्लेटफॉर्म की तरफ से कहा गया है कि वे खुद इस बात के पक्षधर हैं

कि व्यक्ति की निजता की सुरक्षा होनी चाहिए।

इसी वजह से कंपनी ने अपनी तरफ से इजराइल के कंपनी के खिलाफ

कानूनी मुकदमा दायर किया है।

जासूसी स्पाईवेयर के विवाद में कपिल सिब्बल भी कूदे

इस विवाद में राहुल गांधी की प्रथम टिप्पणी के बाद कांग्रेस के नेता कपिल

सिब्बल भी कूद पड़े हैं। गृह मंत्रालय के इंकार के बाद श्री सिब्बल ने सवाल

किया है कि पहले सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वाकई

सरकार ने इसे खरीदा था। अगर इसे खरीदा गया था तो किस विभाग

ने इसे खरीदा था और इसके लिए कितनी कीमत अदा की गयी है।

सिर्फ गृह मंत्रालय के इंकार कर देने से यह मामला टल नहीं सकता है।

व्हाट्सएप को कारण बताओ नोटिस जारी करने के बाद भी इजरायल

की कंपनी को कोई ऐसी नोटिस नहीं दिये जाने पर भी सवाल उठ गये हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जिस कंपनी के स्पाईवेयर की चर्चा हो रही है,

उससे तो सबसे पहले यह पूछा जाना चाहिए कि उसने किसके लिए यह

काम किया है। वैसे कुछ साइबर विशेषज्ञ यह मानते हैं कि इसके बारे में

सरकार को पूरी जानकारी थी। अब भी इस बारे में इंटरनेट पर सर्च किये

जाने की स्थिति में इस स्पाईवेयर के लिंक भारत सरकार के कुछ खास

हिस्सों तक पहुंच रहे हैं। यह बिना सरकारी अनुमति के नहीं हो सकता है।

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