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वैज्ञानिकों की टीम ने कोरोना का आणविक ढांचा तैयार कर लिया

  • खास उपकरण की मदद से संरचना को देखा जा सका

  • अलग अलग विधा के वैज्ञानिक जुटे थे इस काम में

  • बदलाव में जो कुछ हुआ वह बिल्कुल अनजाना है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः वैज्ञानिकों की टीम लगातार काम करती आ रही थी। इस टीम में एचआईवी पर

अनुसंधान करने वाले, सेल्युलर बॉयोलॉजिस्ट, बॉयोफिजिस्ट भी थे। सभी का प्रयास था

कि दुनिया को आंतक के साये में डालने वाला कोरोना वायरस आखिर आणविक तौर पर

कैसे बना है, इसका पता लगाया जाए। अब जाकर इस प्रयास में सफलता मिल गयी है।

इस वायरस की सुक्ष्म संरचना को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने काफी सावधानी और

सुक्ष्मता के साथ साथ इसके पूरे ढांचे की जांच की। इसमें अतिरिक्त सावधानी इसलिए

बरती गयी क्योंकि यह इंसानी प्रतिरोधक क्षमता को चकमा देने वाला वायरस साबित हो

चुका है। इसलिए वैज्ञानिक यह भी जानना चाहते थे कि आखिर यह इंसानी प्रतिरोधक

क्षमता को चकमा कैसे देता है। इस वायरस के प्रोटिन आवरण और संरचना के बारे में

पहले से ही जानकारी मिल चुकी थी। इसके आणविक ढांचा को समझने के लिए वैज्ञानिकों

की टीम ने एक्स रे क्रिस्टालोग्राफी पद्धति का इस्तेमाल किया। इसकी मदद से

ओआरएफ8 का आणविक ढांचा तैयार किया गया। इस ढांचा में दो अलग अलग खास

विशेषताओँ पर ही शोध दल का ध्यान केंद्रित रहा। इसकी पहली विशेषता में वह सार्स कोव

2 था जबकि दूसरे में अन्य वायरस का ढांचा था, जो चमगादड़ से होने वाले वायरस के

बिल्कुल अलग थे। बर्कले के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफसर जेम्स हर्ली ने इस

बारे में कहा कि इन इलाकों में वायरस के प्रोटिन को स्थापित होने के अवसर प्रदान किये

गये थे। दरअसल शोधकर्ताओं ने कोरोना वायरस के उसप्रोटिन आवरण को हटा दिया था,

जो इसे इंसानी प्रतिरोधक से छिपने में मदद करता है। लारेंस बर्कले नेशनल लैब में यह

काम किया गया था। यहां वायरस को बढ़ने का उचित माहौल प्रदान करना भी कोई

आसान काम नहीं था।

वैज्ञानिकों की टीम के लिए यह कोई आसान काम नहीं था

टीकाकरण के बीच महत्वपूर्ण बना मुआवजे का सवालवैज्ञानिकों ने इस बाधा को पार करते हुए वायरस को बढ़ने और अधिक संख्या में

मालिक्यूल बनाने का माहौल प्रदान किया। इसके बीच ही पूरी प्रक्रिया की एक्स रे तस्वीरें

ली जाती रही। इससे इस वायरस की संरचना में क्या कुछ बदलाव हो रहा है, वह पल दर

पल दर्ज होता गया। इसके बाद एक विशेष कंप्यूटर साफ्टवेयर की मदद से इन तमाम

आणविक संरचनाओं में से कोरोना वायरस के आणविक संरचना की पहचान की गयी।

इसके लिए वहां मौजूद हरेक अणु का अध्ययन किया गया। कंप्यूटर की मदद के बिना

हरेक ढांचे का विश्लेषण करने में वर्षों का समय लग सकता था। लेकिन काम पूरा होने के

बाद कोरोना वायरस के अणु का थ्री डी इमेज तैयार कर पाना संभव हो पाया है। इस शोध

से जुड़े बॉयोफिजिस्ट मार्क एलायर कहते हैं कि यह वायरस अन्य वायरसों के मुकाबले

बिल्कुल दूसरे तरीके से आचरण कर रहा है। यह देखा गया है कि वायरस कई बार अपने

अंदर से न्यूक्लिक एसिड की अधिक मात्रा पैदा कर अन्य इलाकों तक वायरस संक्रमण को

पहुंचाने का काम करता है। इसकी वजह से दूसरे इलाकों में भी यह अधिक संख्या में

फैलता जाता है। इसलिए कोरोना वायरस के जिनोम कोड ओआरएफ 7 को ही शोध के केंद्र

में रखा गया था। चमगादड़ों में पाया जाने वाला यह वायरस इसी जिनोम कोड के सहारे

काम करता है। आणविक स्तर पर होने वाले बदलाव की वजह से प्रोटिन का आकार भी

दोगुणा हो गया। लेकिन आकार बढ़ने की वजह से इसकी आणविक संरचना को समझ

पाना वैज्ञानिकों के लिए आसान हो गया है।

कई नई जानकारी मिली है, जिस पर शोध अभी जारी है

लेकिन अजीब स्थिति यह रही कि प्रोटिन के बढ़ते आकार के अलावा जो दूसरा हिस्सा

बना, वह वैज्ञानिकों के लिए अनजाना था। इस बारे में प्रकाशित शोध प्रबंध में यह स्पष्ट

कर दिया गया है कि इस अनजाना दूसरे हिस्से के विश्लेषण का काम भी चल रहा है ताकि

कोरोना की आणविक संरचना के बाद उसके आकार के बढ़ने के बाद जो बदला नजर आये

हैं, उसके बारे में भी ठोस वैज्ञानिक जानकारी दी जा सके।

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