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गंगा में चला गया घर अब तो शौचालय का सहारा

  • एक साल में नहीं मिली कोई भी मदद

  • जिनके पास उपाय था वे कहीं और गये

  • स्कूल में सिर्फ यह शौचालय ही बचा था

  • फिर से आया गंगा में जमीन जाने का खतरा

प्रतिनिधि

मालदाः गंगा में चला गया था गांव का एक बहुत बड़ा हिस्सा। इस हिस्से के गंगा की

कटान में जाने का एहसास लोगों को होने लगा था। इसलिए किसी तरह जो कुछ हाथ

लगा, उसे लेकर लोग भाग निकले थे। अब घर और जमीन गंगा के अंदर जा चुके हैं। किसी

तरह जान बचाकर लौटे हैं तो सरकारी स्कूल के दो शौचालयों में ही आसरा लेना पड़ा है।

पिछले साल से अब तक ऐसे लोगों के लिए सरकारें कुछ भी नहीं कर पायी है।

दरअसल जब गंगा में गांव का एक हिस्सा धंसने लगा तो इस सरकारी स्कूल का अधिकांश

इलाका भी बह चुका है। किसी तरह किनारे बने दो शौचालय बचे हुए थे। अब उन्हीं दो

शौचालयों में सर छिपाकर रहने को मजबूर हैं मंडलपाड़ा के निवासी सहदेव मंडल और

उनका परिवार। चार सदस्यों के इस परिवार ने अपनी जरूरतों के हिसाब से आस पास के

इलाके में टीन के चादरों से कुछ इलाका घेर रखा है। इसी अस्थायी ठिकाने में ठौर मिला है

सहदेव मंडल, उनकी पत्नी मौसमी मंडल और उनकी दो नाबालिग बेटियों को।

सहदेव मंडल की खेती की जमीन भी गंगा में समायी

जिस जमीन पर वह खेती किया करते थे,वह भी अब गंगा के नीचे है। सहदेव के पास अपनी जमीन भी अब नहीं बची।  शोभापुर- पारदेवनापुर पंचायत के इन्हीं दो शौचालयों में दिन काट रहा है यह परिवार। पिछले साल से अब तक अनेकों बार हर किसी कार्यालय में मदद की गुहार लगा चुका है यह परिवार।

पिछले एक साल से इस कठिन समय को झेल रही पत्नी मौसमी की शिकायत है कि

चुनाव के वक्त आने वाले हर नेता की जुबान से त्वरित मदद का भरोसा मिला था। चुनाव

के बाद आज तक कोई दोबारा झांकने तक नहीं आया। इस परिवार की तरह अन्य लोगों

की भी जमीन गंगा में चली गयी थी। जिनके पास दूसरा इंतजाम था, वे इस इलाका को

छोड़कर अन्यत्र चले गये हैं। लेकिन सहदेव की यह पुश्तैनी जमीन थी तो वह इस इलाका

को छोड़कर कहीं और जा भी नहीं सकते क्योंकि उनके पास इसके अलावा कुछ नहीं है।

गंगा में चला गया स्कूल बचे सिर्फ शौचालय

स्कूल के जो दो शौचालय किसी तरह बच गये हैं, उन्हें ही घेरकर किसी तरह आसरा बनाया है। टीन और प्लास्टिक बिछाकर आस पास का इलाका घेरा गया है।

इसी से उनकी जिंदगी गुजर रही है। यहां बिजली भी नहीं मिल सकती सो बरसात में भी

अंधेरे में रहता है यह परिवार। जबकि इलाके में गंगा के करीब हमेशा ही अचानक आने

वाली बाढ़ से फिर से तटबंध टूटने का खतरा हमेशा ही बना हुआ है। कई बीघा जमीन के

मालिक अब भूमिहीन है। कुछ दिन मजदूरी करने भी परिवार का पेट पाला था। अब लॉक

डाउन के बाद से मजदूरी भी मिलना मुश्किल हो चुका है।

मामला चर्चा में आने के बाद ग्राम पंचायत के सदस्य विकास मंडल ने कहा कि यह

परेशानी सभी की जानकारी में है। सरकार की तरफ से जमीन का पट्टा बांटा जाना है।

कोरोना की वजह से सब कुछ गड़बड़ हो गया है। अब जमीन का पट्टा बंटेगा तो इस परिवार

को प्राथमिकता के आधार पर मदद मिलेगी।

इस बारे में ग्राम प्रधान सुस्मिता रविदास ने कहा कि पिछले वर्ष जिनलोगों का नुकसान

हुआ था, सभी की सूची सरकार को भेजी गयी है। वहां से स्वीकृति आने के बाद ही सभी के

बीच मदद और राहत का बंटवारा किया जाएगा।


 

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