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70 हजार स्थानीय बुनकर लॉकडाउन से दाने दाने को मोहताज

इटावाः 70 हजार स्थानीय बुनकर इनदिनों कोरोना लॉक डाउन का कहर झेल रहे हैं।

कोराना महामारी से बचाव के लिये जारी लॉकडाउन के चलते हस्तशिल्प कला के धनी

इटावा मे करीब 70 हजार बुनकर रोजी रोटी को मोहताज हो गये हैं। इटावा में हस्तनिर्मित

कपड़े की एक जमाने में चीन,जापान और कनाडा समेत दुनिया के कई विकसित देशों में

जबरदस्त मांग हुआ करती थी। यहां का बुनकर कारोबार देश के विदेशी मुद्रा भंडार मे

उल्लेखनीय योगदान करता था लेकिन सरकार की नीतियों और बदलते जमाने के साथ

अब वो बीते दिनो की बात मानी जायेगी। हालात यह है कि इटावा के बुनकर दशकों से

बदहाली के साये जीवन बसर करने को मजबूर है और अब लॉक डाउन ने उन्हे दाने दाने

को मोहताज कर दिया है। बुनकर मोहम्मद जीशान कहते है कि किसानों के गेहूं की तरह

उनका भी बना माल सरकार खरीदे ताकि उनका परिवार इस कठिन समय का सामना कर

सके। एक दूसरे बुनकर मजदूर नसीम ने कहा ‘‘ लॉकडाउन के बाद अब केवल जी रहे है

और कुछ भी नही है । हमारे करधे पूरी तरह से ठंडे हो चले है क्योंकि हमको सूत नही मिल

पा रहा है । हम कह सकते है कि हमारे पास खाने को तो है लेकिन चूल्हा जलाने को लकड़ी

नहीं है।’’ बुनकर कारखाना संचालक अमीन ने कहा कि लॉक डाउन के कारण कारोबार

पूरी तरह से ठप है क्योंकि अभी कोई भी कच्चा माल नही आ पा रहा है और जब कच्चा

माल आयेगा नहीं तो आखिर पक्का करेंगे क्या। मजदूरों का भी पैसा देने के लिए नही है

इसलिए बहुत ही दिक्कत है ।

70 हजार बुनकरों के पास काम चालू करने का भी पैसा नहीं

यह काम का बड़ा समय था आगे आने वाला समय बरसात का है जिसमे बुनकर कार्य बंद

रखना होता है । पहले से जो माल बना करके रखा हुआ भी है वो कही बाहर भेजने की

स्थिति नही बन पा रही है । ’’ सूत रंगाई का काम करने वाले मोहम्मद सद्दाम ने कहा कि

जब से यह लॉकडाउन हुआ है तब से सूत के रंगाई का काम बिल्कुल बंद हो गया है।

कारीगर के पास खाने तक के पैसे नही आ पा रहे है । लॉकडाउन के चलते बुनकरी बिल्कुल

ही बंद हो गई है । केवल परेशानी ही परेशानी है ।


 

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