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56 साल पुराना सैटेलाइट इसी सप्ताह गिरेगा पृथ्वी पर

  • पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर चुका है

  • उम्मीद है कि अधिकांश हिस्सा जल जाएगा

  • वायुमंडल के बाहर एकत्रित है ढेर सारा कचड़ा

  • खतरे की कोई बात नहीं इस पुराने सैटेलाइट से

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः 56 साल पुराना एक सैटेलाइट इसी सप्ताह पृथ्वी पर गिरने जा रहा है। वैसे

इसके गिरने की आशंका जाहिर करने के साथ ही वैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि

इससे पृथ्वी के किसी हिस्से में कोई खतरे जैसी बात नहीं है। लेकिन वैज्ञानिकों ने यह

आशंका दोहरायी है कि अंतरिक्ष अभियानों की वजह से अंतरिक्ष में मानवसृजित इतना

कचड़ा एकत्रित हो गया है कि वह भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों और अंतरिक्ष में चक्कर

काटते सक्रिय सैटेलाइटों के लिए ही खतरा बनता जा रहा है। इसके पहले भी पृथ्वी के

वायुमंडल के बाहर पुराने सैटेलाइटों की टक्कर हो चुकी है। इससे कचड़ा और बढ़ गया है।

56 साल पुराना जो सैटेलाइट अब गिरने जा रहा है वह सितंबर 1964 में अंतरिक्ष में भेजा

गया था। इस सैटेलाइट का नाम ओजीओ -1 था। इसे अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल की

स्थिति का अध्ययन करने के लिए भेजा गया था। साथ ही इस सैटेलाइट में लगे यंत्रों की

यह जिम्मेदारी भी थी कि वह यह बताये कि सूर्य की किरणों अथवा सीधे सूर्य का इस

पृथ्वी पर क्या प्रभाव पड़ता है। इस सैटेलाइट ने वर्ष 1969 तक अपना मिशन पूरा कर

लिया था। उसके बाद वर्ष 1971 में आधिकारिक तौर पर इसे निष्क्रिय घोषित कर दिया

गया था। तब से यह सैटेलाइट पृथ्वी की बाहरी परिधि से भी बाहर चुपचाप चक्कर काट

रहा था। निष्क्रिय अवस्था में भी यह हर दो दिन में पृथ्वी के चक्कर काटने का काम पूरा

कर लेता था। अंतरिक्ष में बिखरे पड़े अवशेषों पर नजर रखने वाले वैज्ञानिक इस पर नजर

रखे हुए थे।

गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में नीचे आ रहा है सैटेलाइट

अब वैज्ञानिकों ने पाया है कि वायुमंडल के बाहर होने के बाद भी यह निष्क्रिय सैटेलाइट

अब पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आ चुका है। इसलिए वह चक्कर लगाता हुआ तेजी

से पृथ्वी के करीब आता जा रहा है। गणना के मुताबिक एक खास सीमा तक चक्कर

काटने के बाद वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के सीधे प्रभाव मे आ जाएगा। वैसी स्थिति में 56

साल के बाद यह अंततः पृथ्वी की तरफ तेजी से आ गिरेगा। इसके गिरने का अनुमान इसी

सप्ताह के अंत तक लगाया गया है। इस समाचार के लिखे जाने तक यह सैटेलाइट पृथ्वी

के गुरुत्वाकर्षण के क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है और तेजी से चक्कर काट रहा है। फिर भी 56

साल पुराने इस सैटेलाइट के गिरने का जो इलाका समझा गया है वह दक्षिण प्रशांत

महासागर का इलाका है। वैज्ञानिकों ने जहां पर इसके गिरने का अनुमान लगाया है वह

ताहिती और कूक द्वीप के बीच में है। लिहाजा समुद्र में गिरने की वजह से आबादी को

इससे कोई नुकसान होने का अंदेशा नहीं है।

56 साल पुराना सैटेलाइट दक्षिण प्रशांत महासागर में गिरेगा

56 साल पुराना यह सैटेलाइट पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में कई हिस्सों में बंट

जाएगा। सबसे अधिक संभावना इसी बात की है कि इसके सारे हिस्से हवा में ही जलकर

राख हो जाएंगे और सिर्फ गर्म राख के हिस्से ही समुद्र में आकर गिरेंगे। इस 56 साल पुराने

सैटेलाइट के बारे में यह जान लेना जरूरी है कि अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए इस किस्म के

छह सैटेलाइट छोड़े गये थे। पहला सैटेलाइट 1965 में भेजा गया था और अंतिम को 1969

में रवाना किया गया था।

वैसे यह एक घटनाक्रम वैज्ञानिकों की चिंता इसलिए बढ़ा रहा है क्योंकि अंतरिक्ष में पृथ्वी

के वायुमंडल से ठीक बाहर मानव सृजित कचड़े के भरमार होती चली जा रही है। ऐसे

अंतरिक्ष के कचड़े वायुमंडल के बाहरी हिस्से को घेरते चले जा रहे हैं। इससे भविष्य के

महाकाश अभियानों के लिए अप्रत्याशित खतरा उत्पन्न हो सकता है।


 

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