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37 लाख मील प्रति घंटे की रफ्तार से भाग निकला एक तारा




  • ब्लैक होल के पास से तेज गति से भागा
  • शायद इस सौर जगत को पार कर जाएगा
  • पांच लाख साल पहले की घटना अभी नजर आयी
  • अंतरिक्ष की अनोखी घटना कैद हुई खगोल दूरबीन में
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः 37 लाख मील प्रति घंटे की रफ्तार कोई कम नहीं होती।

इस रफ्तार से अगर कोई छोटा सा उल्कापिंड भी पृथ्वी पर आ गिरा

तो बहुत बड़ी तबाही आ जाएगी। लेकिन वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि

पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते ही घर्षण की वजह से यह रफ्तार घट

जाएगी और अंदर आने वाला पदार्थ इसकी चपेट में आकर जलने

लगेगा। पृथ्वी पर आ गिरने वाले सभी उल्कापिंडों के साथ ऐसा ही

होता है। इसलिए जो आकार में बहुत बड़ा होता है, वही उल्कापिंड एक

बड़े जलते हुए पत्थर की तरह पृथ्वी से आ टकराता है। खैर यह पृथ्वी

की बात छोड़ दें तब भी 37 लाख मील प्रति घंटे की तेज गति से किसी

तारे का निकलना पहली बार देखा गया। वैज्ञानिक इस बात को देखकर

भी हैरान हुए हैं कि दरअसल सुदूर अंतरिक्ष के दुधिया पथ(मिल्की वे)

की यह घटना है। वहां से एक तारे को उगल दिये जाने की यह घटना

खगोल दूरबीन में कैद हुई है। बाद में वैज्ञानिकों ने इसका

गहन विश्लेषण भी किया है। आम तौर पर इस क्षेत्र से किसी तारे के

बाहर निकलने की घटना आम नहीं होती। इस वजह से भी वहां से भाग

निकलने वाले इस तारे की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही

है। वैज्ञानिक घोषणा के मुताबिक जो तारा वहां से बाहर निकला है

उसका नाम एस 5-एच वी एस 1 रखा गया है। इस पर खगोल

वैज्ञानिकों की नजर पहले से ही थी। यह एक ब्लैक होल के ईर्दगिर्द

चक्कर काट रहा था। इसी घूमने के दौरान उसकी गति लगातार तेज

होती चली गयी। दुधिया पथ के बाद इसकी गतिविधियों को एंग्ले-

ऑस्ट्रेलियन टेलीस्कोप से देखा गया है। यह खगोल दूरबीन

आस्ट्रेलिया के कोनाबाराब्रान में स्थापित है।

37 लाख किलोमीटर की रफ्तार सौर मंडल से बाहर

इस पूरे घटनाक्रम ने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। आम तौर पर

यह तारा  सामान्य तारों की गति के मुकाबले बहुत तेज गति हासिल

कर चुका था। 37 लाख मील यह गति औसत तारों की गति से दस

गुणा अधिक है। फिलहाल इतनी तेज गति से बाहर निकलने के बाद

यह तारा अब भी आगे की तरफ भागता ही चला जा रहा है। वैज्ञानिक

इसकी तेज गति की वजह से ऐसा मान रहे हैं कि शायद यह सौर मंडल

से आगे की तरफ निकल जाएगा और दोबारा फिर कभी शायद वापस

भी नहीं आयेगा। इस किस्म के एक तारे की पहचान अभी से करीब दो

दशक पूर्व हुई थी। लेकिन इतनी तेज गति का तारा बाहर निकलता

हुआ पहली बार देखा गया है। वैज्ञानिक अब तक यह जानते हैं कि

ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आने के बाद हर तारा उसके

चारों तरफ चक्कर काटता हुआ टूटकर विखंडित हो जाता है। उसके

बाद तारों के गैस आस-पास के इलाकों में फैल कर उसे रोशन कर देते

है। तारा का मूल हिस्सा ब्लैक होल के अंदर समा जाता है। कई बार

ब्लैक होल के अंदर से भी तारों को उगल देने की घटना दूरबीन में कैद

हो चुकी है। लेकिन यह अपने आप की पहली घटना है जिसमें कोई

तारा दुधिया क्षेत्र में ब्लैक होल के बाहर से तेज गति से दूसरी तरफ

चला गया है। इस बारे में खगोल वैज्ञानिक डगलस बाउबर्ट का कहना है

कि इसकी तेज गति की वजह से ही यह उम्मीद जतायी जा रही है कि

यह एक सौर मंडल को पार कर कहीं और चला जाएगा। लेकिन वह

अंततः कहां जाता है और किस अवस्था में होता है, इसकी जानकारी से

खगोल विज्ञान को फायदा होगा।

इस तारे के अंतिम ठिकाना को भी समझना चाहते हैं वैज्ञानिक

वैज्ञानिक अब तक के घटनाक्रमों पर गौर करने के बाद इस नतीजे पर

पहुंचे हैं कि ब्लैक होल का आचरण भी शायद ऊर्जा की स्थिति पर

निर्भर करता है। जब विपरीत ऊर्जा वाले दो तारे एक दूसरे के करीब

होने के बाद ब्लैक होल के संपर्क में आते हैं। तो इन दोनों तारों को

अपने चारों तरफ घूमाने के बाद ब्लैक होल एक तारा को निगल लेता है

और दूसरे को काफी दूर धकेल देता है। इसी विकर्षण के दौरान तारों की

गति इतनी तेज हो जाती है कि वह एक सौर मंडल से दूसरे सौर मंडल

तक चले जाते हैं। इस बारे में वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि जिस

घटना को वह अभी देख पा रहे है वह शायद काफी पुरानी और संभवतः

पांच लाख वर्ष पुरानी घटना है। काफी दूरी पर होने की वजह से घटना

के प्रकाश तरंग अब पृथ्वी तक पहुंचे हैं तो वैज्ञानिकों को यह नजारा

देखने को मिला है। इस लिहाज से यह भी माना जा रहा है कि दरअसल

यह घटना पृथ्वी के उस काल की है जब इंसान के पूर्व पुरुष धीरे धीरे

अपने दो पैरों पर चलनी सीख रहे थे यानी इंसान की प्रजाति चौपाया से

दो पाया जानवर बनने की प्रक्रिया में थी।



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