थ्री डी प्रिंटिंग से मालद्वीप में बना दिया प्रवाल का ठिकाना

थ्री डी प्रिंटिंग से तैयार ढांचे को जोड़ते वैज्ञानिक
  • मेलबोर्न के वैज्ञानिकों की पहल

  • अलग अलग ढांचों को तैयार किया

  • समुद्र के सीत मीटर अंदर उन्हें जोड़ा

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः थ्री डी प्रिंटिंग तकनीक ने फिर से एक नई उम्मीद जगायी है।

इस बार मेलबोर्न के वैज्ञानिकों ने इस थ्री डी प्रिंटिंग तकनीक के इस्तेमाल से नकली प्रवाल आधार (कोरल रीफ) बनाये।

इन्हें मालद्वीप के समुद्र में स्थापित किया।

अब वहां फिर से कोरल रीफ स्थापित हो गये हैं और समुद्री जीवन बेहतर हो गया है।

मालद्वीप के इस समुद्री इलाकों में प्रदूषण की वजह से सारे कोरल रीफ खत्म हो गये थे।

इससे वहां का समुद्री जीवन भी खतरे में पड़ गया था।

लगातार पर्यावरण को होने वाले नुकसान से चिंतित वैज्ञानिकों के एक दल ने प्रयोग के तौर पर इसे आजमाया।

यह प्रयोग सफल रहा और अब यह उम्मीद बंधी है कि जहां जहां समुद्र में

प्रवाल के ढेर प्रदूषण की वजह से समाप्त हो गये हैं,

वहां फिर से समुद्री प्रवाल को नये सिरे से बसाया जा सकता है।

देखें इस प्रयोग का वीडियो 

इससे प्रवाल के ढेर के आस-पास जीवन बसर करने वाले 25 प्रतिशत समुद्री मछलियों का जीवन भी सुरक्षित हो जाएगा।

वैज्ञानिकों ने जब यह काम करने की ठानी तो उनलोगों न औद्योगिक थ्री डी प्रिंट की डिजाइन बनाने वाले इंजीनियर एलेक्स गोड से संपर्क किया।

एलेक्स ने मालद्वीप के प्रवाल का अध्ययन कर उसके जैसा सिरामिक ढांचा तैयार किया।

विशाल ढांचा कई खंडों में तैयार किया गया। पूरा ढांचा बन जाने के बाद उसे हवाई जहाज से मालद्वीप ले जाया गया।

इस ढांचे में कैल्सियम कार्बोनेट होने की वजह से समुद्र के पानी में उसके लंबे समय तक टिके होने की वजह से ही ऐसा ढांचा बनाया गया था।

दूसरी तरफ कोरल रीफ में भी कैल्सियम कार्बोनेट ही हुआ करता है।

इन तमाम ढांचों को मालद्वीप के समर द्वीर पर लाने के बाद उन्हें समुद्र के अंदर

जोड़ना कोई आसान काम नहीं था।

थ्री डी प्रिंटिंग से बने ढांचों को समुद्र के अंदर जोड़ा

थ्री डी प्रिंटिंग से तैयार ढांचे पर कोरल रीफवैज्ञानिकों ने समुद्र के अंदर सात मीटर की गहराई में उन्हें एक एक कर जोड़ा

और उसे एक बड़े प्रवाल आधार का स्वरुप प्रदान किया।

इस ढांचा को तैयार करने के बाद बड़ी ही सावधानी से उसमें जिंदा प्रवाल स्थापित किये गये।

अब इसके तैयार होने के बाद उसके आस-पास मछलियां मंडराने लगी हैं।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि अगले दो-तीन वर्षों में वहां बसाये गये जिंदा प्रवाल ही

वहां की स्थिति को पूरी तरह पूर्ववत बना देंगे।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहा तो समुद्र के अंदर प्रदूषण की वजह से जहां जहां ऐसा नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई हो पायेगी।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी थ्री डी प्रिंटिंग तकनीक के आधार पर

वैज्ञानिकों ने कृत्रिम अंग भी तैयार किये हैं, जहां सफल प्रत्यारोपण भी किया गया है।

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