fbpx Press "Enter" to skip to content

भारत में विभिन्न किस्म की 250 फसलों की किस्में विकसितः महापात्रा

नयी दिल्लीः भारत में में विभिन्न किस्म की 250 फसलों की प्रजाति विकसित की गयी

है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक त्रिलोचन महापात्रा ने गुरुवार को कहा

कि जलवायु परिवर्तन और कुपोषण की समस्या को दूर करने के मद्देनजर हाल के वर्षों में

फसलों की करीब 250 ऐसी किस्मों का विकास किया है जो जलवायु परिवर्तन सहनशील

तथा पोषक तत्वों से भरपूर है। डॉ महापात्रा ने परिषद की 91वीं वार्षिक आम बैठक को

सम्बोधित करते हुए कहा कि फसलों की 220 अलग-अलग किस्मों का विकास किया गया

है जिनमें से 189 जलवायु परिवर्तन सहनशील हैं। पिछले चार साल के दौरान फसलों की

52 जैविक रूप से संवर्धित (बायो-फोर्टिफाइड) किस्मों का विकास किया गया है जो

विटामिन और खनिज पदार्थों से परिपूर्ण है। कुछ राज्यों में कुपोषण को दूर करने के लिए

बायो-फोर्टिफाइड किस्मों का भोजन में उपयोग किया जा रहा है और उसके अच्छे परिणाम

भी सामने आने लगे हैं। उन्होंने कहा कि गेहूं की एक एचडी 3226 किस्म का विकास किया

गया है जिसमें सात बीमारियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता है और अनुकूल परिस्थिति में

प्रति हेक्टेयर आठ से नौ टन का उत्पादन है। गेहूं की इस किस्म की औसत उपज छह टन

प्रति हेक्टेयर है। सोयाबीन की एनआरसी 127 ऐसी किस्म है जो प्रोटीन से भरपूर है और

इसमें प्रोटीन को पचाने की अद्भूत क्षमता है। अमरूद की अर्क किरण गुणों से भरपूर है।

भारत में किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखा गया है

डॉ महापात्रा ने कहा कि एक निजी कम्पनी के साथ मिलकर सोयाबीन से दूध निकालने का

एक संयंत्र विकसित किया गया है। देसी पशुओं की 15 नस्लों की हाल में पहचान की गयी

है। इससे पहलें 184 ऐसी नस्लों की पहचान की गयी थी। पशुओं में नौ बीमारियों की

रोकथाम के लिए टीकों का विकास किया गया है और इनका व्यवसायीकरण किया जा

रहा है।

भारत में सूअर में क्लासिकल स्वाई फीवर की रोकथाम के लिए एक टीका विकसित किया

गया है जिसका प्रभाव दो साल तक रहता है। इसका मूल्य मात्र दो रुपये है जबकि बाजार

में जो टीके उपलब्ध है उसकी कीमत 20 से 25 रुपये है। उन्होंने कहा कि मत्स्य उत्पादन

में वृद्धि के लिए मछलियों की 61 ब्रीडिंग प्रोटोकाल तैयार कर लिया गया है, इसके साथ ही

सजावटी मछलियों का ब्रीडिंग प्रोटोकाल तैयार हुआ है जिससे लोगों को रोजगार मिलने के

साथ ही आर्थिक लाभ भी होगा। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर काली

मिर्च की खेती के लिए नये जगहों की तलाश की जा रही है।

खेती के क्षेत्र में इंजीनियरिंग का भी इस्तेमाल अब

डॉ महापात्रा ने कहा कि इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नये-नये प्रयोग किये जा रहे हैं और कृषि के

लिए 14 नयी मशीनें तैयार की गयी है। संस्थान 14 नये प्रौद्योगिकी का व्यावसायीकरण

किया है। उन्होंने कहा कि राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों में 17 उत्कृष्टता केन्द्रों की

स्थापना की गयी है। उच्च कृषि शिक्षा के क्षेत्र में 50 प्रतिशत से अधिक महिलायें आ रही है

जिसके मद्देनजर नयी-नयी सुविधाओं का विकास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि देश में

16 लाख से अधिक किसानों को प्रशिक्षण दिया गया है और 170 मोबाइल ऐप जारी किये

गये हैं। वर्ल्ड वेजिटेबल सेंटर के साथ एक समझौता किया गया है और वह जीन एडिटिंग

की प्रौद्योगिकी देने को तैयार है। इससे सब्जियों के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आने की

संभावना है


 

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

One Comment

Leave a Reply

Open chat
Powered by