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काल्पनिक सोच को सच साबित कर दिखाया जेनेटिक वैज्ञानिकों ने

  • चौबीस हजार वर्ष पूर्व जमे अवशेष को जिंदा किया

  • जुरासिक पार्क फिल्म की सोच को साकार किया गया

  • यह सुक्ष्म प्राणी खुली आंखों से भी नजर नहीं आता

  • रुस के वैज्ञानिकों ने यह कमाल कर दिखाया है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः काल्पनिक सोच ही थी जिसके आधार पर जुरासिक पार्क की फिल्में बनी थी। वैसे

भी जेनेटिक वैज्ञानिक काफी अरसे से पुराने अवशेषों से भी डीएनए प्राप्त कर किसी भी

विलुप्त प्रजाति को फिर से जीवंत बनाने की सोच पर भी अनुसंधान कर रहे हैं। जुरासिक

पार्क की फिल्मों की श्रृंखला में भी पूर्व के डीएनए से विलुप्त डायनासोर को जीवित करने

की कहानियों को अलग अलग तरीके से परोसा गया है। इस बार चौबीस हजार वर्ष पूर्व

जम चुके एक सुक्ष्म प्राणी को फिर से जीवित करने की काल्पनिक सोच के शोध सफल

होने का दावा किया गया है। जिस सुक्ष्म प्राणी पर यह शोध हुआ है उसे रोटिफायर भी कहा

जाता है। यह पिछले चौबीस हजार वर्षों से शीतनिद्रा की अवस्था में था। उसे ही वैज्ञानिकों

ने न सिर्फ जीवित किया है बल्कि वह अपनी दैनिक काम काज को निपटाने लगा है। यह

प्राणी खुली आंखों से भी नजर नहीं आता है। माइक्रोस्कोप से नजर आने वाले इस प्राणी

को आर्कटिक के बर्फीले प्रदेश से वैज्ञानिकों ने खोज निकाला था। इसपर हुए शोध का

निष्कर्ष है कि यह सुक्ष्म प्राणी काफी अरसा पहले साइबेरिया के इलाके में ताजा पानी में

पाया जाता था। यह बहुकोषिय सुक्ष्म प्राणी चौबीस हजार वर्षों से जमा पड़ा था, उसकी

जांच करने तथा उसको दोबारा जीवित करने का प्रयोग सफल होने के बाद वैज्ञानिक यह

मानते हैं कि इस विधि को बेहतर तरीके से समझ लेने के बाद किसी भी प्राणी को इस

अवस्था में भेज पाना संभव होगा, जहां से उसे आवश्यकता पड़ने पर दोबारा पूरी तरह

सुरक्षित तौर पर जीवित भी किया जा सकेगा।

काल्पनिक सोच को सुक्ष्माणु पर सफल किया गया है

रुस के इंस्टिट्यूट ऑफ साइकोकेमिकल एंड बॉयोलॉजिकल केंद्र के वैज्ञानिक स्टास

मालाविन ने कहा कि हजारों वर्षों तक इस अवस्था में रहना सिर्फ बर्फ के बीच ही संभव है

क्योंकि उस दौरान बर्फ में जमा होने की वजह से किसी शरीर का क्षरण नहीं होता है।

चौबीस हजार वर्षों तक इस अवस्था में होने को वैज्ञानिक परिभाषा में क्रिप्टोबॉयोसिस

कहते हैं। इस अवस्था से किसी प्राणी को फिर से जीवित करने का यह अर्थ है कि बर्फ में

पूरी तरह जम जाने के बाद भी इस प्राणी के आंतरिक अंग जम जाने के बाद भी पूरी तरह

ठीक थे। इस दौरान शरीर का आंतरिक मेटाबॉलिज्म पूरी तरह बंद हो गया था और अंदर

के अंग भी जम गये थे। जिस कारण यह अंदर से भी पूरी तरह ठीक था। वरना बाहर से

जमने के बाद भी शरीर की अपनी गर्मी की वजह से बड़े प्राणियों के आंतरिक अंग बर्फ में

दबने के दौरान नष्ट हो जाने के प्रमाण मौजूद हैं। अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका करेंट

बॉयोलॉजी में इस बारे में शोध प्रबंध प्रकाशित किया गया है। रोटीफार्स नामक इस प्राणी

को व्हील एनिमाकूल्स भी कहा जाता है। उसके नाम में व्हील इसलिए जुड़ा हुआ है क्योंकि

उसके शरीर के निचले हिस्से में छोटे छोटे बालों का एक चलता हुआ चक्का बना होता है।

इसी चक्के की मदद से वह चलता फिरता है। मालाविन की टीम इस किस्म के शोध में

काफी अरसे से जुड़ी हुई है। यह दल ड्रील का इस्तेमाल कर गहरे बर्फ के अंदर से नमूने

एकत्रित कर उनका विश्लेषण करने का काम पहले से करता आ रहा है। इस चौबीस हजार

वर्ष पुराने सुक्ष्म प्राणी को बर्फ से 11 फीट की गहराई से निकाला गया था।

बर्फ की गहराई से निकाला गया था यह अति सुक्ष्म प्राणी

उसकी उम्र का पता लगाने के लिए शोध दल ने कार्बन डेटिंग विधि का प्रयोग किया था।

उसके आधार पर यह पता चला कि यह चौबीस हजार वर्ष से इसी अवस्था में था। शोध के

अगल चरण में उसे न सिर्फ जगाया गया बल्कि पूरी तरह स्वस्थ भी किया गया। इसके

बाद उसके क्लोन के सहारे उसकी वंशवृद्धि का प्रयोग भी सफल रहा है। बर्फ में पाये गये

बड़े आकार के प्राणी इस विधि से जीवित नहीं किये जा सकते हैं क्योंकि वे शीत निद्रा की

अवस्था में नहीं होते और अंदर के अंग इस अवस्था में खराब हो जाते हैं। यह सुक्ष्म प्राणी

अंदर से भी सुरक्षित रहा था। वैज्ञानिकों ने पानी का भालू कहे जाने वाले एक और सुक्ष्म

प्राणी टारडिग्रेड के जीवन पर भी शोध किया है। उसके बारे में पहले से ही यह प्रमाणित हो

चुका है कि वह ठंड और भीषण गर्मी के अलावा तेज विकिरण को भी झेल सकता है। इस

टारडिग्रेड पर बंदूक की गोली का प्रभाव भी जांचा गया है, जिसे यह सुक्ष्म प्राणी झेल गया

है। चौबीस हजार वर्ष पुराने इस सुक्ष्म प्राणी को जीवित करने में सफल होने के बाद

वैज्ञानिक बर्फ में दबे पड़े वायरसों की भी जांच कर रहे हैं और यह देख रहे हैं कि जमी हुई

अवस्था में पाये जाने वाले यह अति सुक्ष्म प्राणी बर्फ में जमे होने के बाद भी जीवित किये

जा सकते हैं अथवा नहीं। इनमें से कुछ वायरस के बारे में पहले ही पता चल चुका है बर्फ से

बाहर आने के बाद उनमें से कुछ खुद ही जीवित हो उठते हैं। इस काल्पनिक सोच को

इंसानों पर आजमाने की चर्चा भी काफी अरसे से हैंलेकिन अब तक यह प्रयोग आजमाया

नहीं गया है। 

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