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मुश्किल सवाल सिर्फ कांग्रेस के सामने ही नहीं हैं




मुश्किल सवालों पर कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के बयान का भाजपा ने राजनीतिक लाभ उठाया है।

सैम पित्रोदा ने सिक्ख दंगे के संदर्भ में कहा था कि यह पुरानी बात ही, वह हुआ तो हुआ

अब आज की बात कीजिए। समग्र तौर पर इस बात को कतई अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए था।

लेकिन जिस चुनाव में जनता के मुद्दों पर हर नेता बोलने से कतराता है,

उस चुनाव में हर ऐसे बयान का दूसरा अर्थ निकाला ही जाना तय है।

इसी वजह से श्री पित्रोदा के बयान के तुरंत बाद भाजपा का हमला जारी हो गया।

खुद प्रधानमंत्री तीन दिनों से अपने चुनावी सभाओं में इसी बात की रट लगाये हुए हैं।

लेकिन इस किस्म के मुश्किल सवाल तो खुद नरेंद्र मोदी के सामने खड़े हैं।

कई गैर राजनीतिक सर्वेक्षणों ने इन सवालों को बार बार जनता के सामने प्रस्तुत कर दिया है।

ये सवाल हैं रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं का। रोजगार के मुद्दे पर प्रधानमंत्री का जो दावा था,

वह सरकारी आंकड़ों में पूरी तरह विफल हो गया है।

इसी तरह बड़े दावे के साथ जिस नोटबंदी की घोषणा की गयी थी,

वह गाड़ी पूरी तरह अपनी पटरी से उतरने के साथ साथ देश की अर्थव्यवस्था तक को पटरी से उतार चुकी है।

भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनने के बाद

अनेक चुनावी सभाओं में खुद नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को

मौन मोहन कहकर उनका मजाक उड़ाया था।

मुश्किल सवाल तो अब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भी

लेकिन घटनाक्रम यही दर्शाते हैं कि नोटबंदी के तुरंत बाद इसी डॉ मौन मोहन ने जिस आशंका को व्यक्त किया था,

वह सच साबित हो गयी।

यानी कम बोले अथवा बिना बोले जिस बात को डॉ मनमोहन सिंह के अनुभवी अर्थशास्त्री समझ रहे थे,

उस सवाल पर अब खुद नरेंद्र मोदी ही मुश्किल सवालों से बचते दिखाई दे रहे हैं।

यह सिर्फ एक बार की बात होती तो नजरअंदाज किया जा सकता था।

लेकिन पूरे चुनाव प्रचार के दौरान अपने पांच साल की उपलब्धियों पर उठने वाले सवालों का

उत्तर देना उनके लिए भी मुश्किल साबित हो चुका है।

दरअसल यह शायद देश का पहला ऐसा चुनाव हो रहा है

जिसमें जनता के मुद्दों पर बहस कम और एक दूसरे को नीचा दिखाने पर बहस अधिक हो रही है।

इसलिए अगर श्री मोदी अकेले कांग्रेस पर मुश्किल सवालों पर गैर जिम्मेदाराना हरकत की

बात कर रहे हैं तो यह उनकी तरफ से भी अपनी जिम्मेदारी से पीछे भागना भी है।

इसी तरह अन्य दलों के प्रमुख नेता भी अपनी उपलब्धियों और भावी योजनाओं से जुड़े सवालों पर

बोलने तक से कतरा रहे हैं जबकि उनकी भी चाल दूसरों को गालियां देने तक की सीमित रह गयी है।

इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि मुश्किल सवाल पर सिर्फ कांग्रेस ही बहानेबाजी करती है।

इस कतार में भाजपा सहित अन्य तमाम बड़े दल एक जैसे ही नजर आ रहे हैं।

जहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सवाल है तो उनके सामने भी भविष्य की कठिन चुनौतियां खड़ी हैं।

इनमें से सबसे मुश्किल सवाल तो राफेल सौदे में प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से हुई बात-चीत का है।

यह सवाल इसलिए भी श्री मोदी के लिए पेचिदा है

क्योंकि इस मुद्दे पर भाजपा की तरफ से हर बार कुछ ऐसी जानकारी दी गयी है,

जो बाद में गलत प्रमाणित होती आयी है।

राफेल पर सवाल तो आगे भी आना बाकी है

वैसे भी यह माना जाना चाहिए कि वरिष्ठ पत्रकार एन राम ने जिस तरीके से

बोफोर्स पर राजीव गांधी पर सवाल उठाये थे, वह सिलसिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम से थमने वाला नहीं है।

श्री राम ने ही पहली बार उन दस्तावेजों को प्रकाशित किया है,

जिससे यह प्रमाणित होता है कि वाकई प्रधानमंत्री कार्यालय इस राफेल विमान सौदे में हस्तक्षेप कर रहा था।

इस मुद्दे पर देश की रक्षामंत्री सहित कई बड़े मंत्री और भाजपा नेताओं ने जो सफाई दी थी,

वह द हिंदू में प्रकाशित एन राम की एक रिपोर्ट से ध्वस्त हो चुकी हैं।

मजेदार स्थिति यह है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में भी है।

जहां एक नहीं कई अवसरों पर केंद्र सरकार की तरफ से गलतबयानी की गयी है।

इनमें से पहली गलती को सीएजी की ऑडिट की रिपोर्ट लोकलेखा समिति के देना है।

दूसरी गलती द हिंदू में प्रकाशित दस्तावेजों को चुराये गये दस्तावेज बताना है।

लेकिन इन तमाम विरोधाभाषों के बीच भी अब खुद सरकार को सुप्रीम कोर्ट में यह स्वीकार करना पड़ा है कि

प्रधानमंत्री कार्यालय इस राफेल विमान सौदे में बात-चीत कर रहा था।

आखिर इस बात-चीत को छिपाने की क्या जरूरत थी,

यह सवाल ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बहुत बड़ा मुश्किल सवाल बनता ही जा रहा है।

पता नहीं इस कड़ी में और कितने सवालों को उन्हें आगे झेलना भी पड़ेगा।



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