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झारखंड की हाई प्रोफाइल सीट दुमका में शिबू सोरेन की प्रतिष्ठ दांव पर




दुमकाः झारखंड की हाई प्रोफाइल सीटों में शुमार दुमका संसदीय सीट पर

झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) सुप्रीमों शिबू सोरेन और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)

प्रत्याशी सुनील सोरेन के बीच सीधी लड़ाई है।

दुमका सीट पर साल 1980 से अबतक आठ बार सांसद निर्वाचित हुए शिबू सोरेन की प्रतिष्ठा दांव पर है,

जबकि भाजपा शिबू सोरेन को बूढ़ा शेर बताकर इस सीट को झपटने की फिराक में है।

इसलिए दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए यह सीट प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गयी है।

करीब चालीस वर्षों से दुमका सीट पर एकक्षत्र कब्जा कायम रखने वाले

75 वर्षीय अपने दिसोम गुरू शिबू सोरेन की जीत सुनिश्चित करने के लिए

झामुमो के कार्यकर्ताओं ने पूरी ताकत झोंक दी है वहीं, भाजपा कार्यकर्ता इस बार मैदान मारने के लिए जी-जान से जुटे हैं।

चुनाव आयोग की सख्ती की वजह से झारखंड की हाई प्रोफाइल बने इस क्षेत्र में चुनाव प्रचार में अभी तक दोनों प्रमुख प्रतिद्वंदी दलों के

कानफाड़ ध्वनि विस्तारक यंत्र (माईक) की आवाज नहीं सुनायी पड़ रही है

और न ही मतदाताओं को कलाकारों के रोचक कलाकारी देखने को मिल रहा है।

पहाड़ियों से घिरे इस इलाके का नाम है संतालपरगना।

झारखंड की हाई प्रोफाइल इस सीट पर है सभी की नजर

दुमका को संतालपरगना का प्रमंडलीय मुख्यालय और राज्य की उप राजधानी का दर्जा हासिल है।

घने जंगलों और पहाड़ी नदियों की शीतल जलधाराओं की तूफानी कोलाहल वाले

इस इलाके को अतीत में जंगल तराई, जंगल महल, दामिन-ई-कोल आदि नामों से जाना जाता था।

18वीं सदी के अंतिम भाग में इस क्षेत्र में संताल आदिवासियों ने इस वन्य प्रांतर में कदम रखा।

संताल समाज के लोग जत्थे में पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले से यहां आये।

बीहड़ जंगलों को साफ कर खेती लायक जमीन बनाया।

संतालों से पहले पहाड़िया और घटवाल जातियों का निवास था। मेगास्थनीज एवं ’’ेन सांग ने अपनी यात्रा विवरणी में इसका उल्लेख किया है।

झारखंड नामधारी दलों की मजबूत पकड़ की बदौलत इस इलाके से जयपाल सिंह की अगुवाई वाले

झारखंड पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशी निर्वाचित होते रहे।

इसके बावजूद इस इलाके का अपेक्षित विकास सम्भव नहीं हो पाया।

विकास की रफ्तार इतनी धीमी की संतालपरगना का प्रमंडलीय मुख्यालय और राज्य की उप राजधानी दुमका

के लोगों के रेल से सफर का सपना आजादी के 64 साल बाद यानि 2011 में साकार हो सका।

शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई आदि के मामले में आज भी यह इलाका पिछड़ा माना जाता है।

70 सालों में राजनीतिक दल अपने प्रतिद्वंदी दलों पर इस क्षेत्र की उपेक्षा करने का

आरोप लगाकर अपना पल्ला झाड़ते रहे है।

कृषि यहां का मुख्य पेशा है लेकिन सिंचाई की कोई समुचित व्यवस्था नहीं रहने के कारण

यहां के किसान सदियों से मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों में पलायन को मजबूर रहे हैं।

कभी घने जंगलों से आच्छादित यह इलाका जंगलों की कटाई से वीरान होता दिख रहा है।



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