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मंगल ग्रह पर पहले पानी था लेकिन तेज हवा में उड़ गया




  • कंप्यूटर मॉडल से इस गुत्थी को सुलझाने में जुटे हैं वैज्ञानिक
  • पृथ्वी की तरह ही वहां भी काफी पानी था
  • कुछ हिस्सा अब भी बर्फ बनकर सतह के अंदर
  • गर्मी में सूर्य के काफी करीब हो जाता है मंगल ग्रह

प्रतिनिधि
नईदिल्लीः मंगल ग्रह में पानी के होने की पुष्टि हो हुई है।

खगोल वैज्ञानिक इसकी कई तरीके से पुष्टि कर चुके हैं।

लेकिन यह पानी आखिर कहां चला गयी, इस पर शोध अभी जारी है।

इस गुत्थी को सुलझाना वैज्ञानिकों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है

क्योंकि यह हमारी धरती की तरह पानी का प्राकृतिक चक्र से बंधा हुआ नहीं है।

हम सभी ने स्कूल में पढ़ा है कि समुद्र और अन्य जलाशयों का पानी गर्म होकर भाप बनता है।

यह भाप आसमान में जाकर बादल में तब्दील हो जाता है।

समुद्र के दक्षिणी पश्चिमी इलाके में जब बादलों का आकार बहुत बड़ा हो जाता है

तो वह ठंडे होने की वजह से भारत के गर्म इलाकों की तरफ बढ़ने लगते हैं।

फिर भारत में मॉनसून की बारिश होती है।

इससे समुद्र एवं अन्य जलाशयों में फिर से पानी घूमकर चला आता है।

पृथ्वी पर पानी का यही प्राकृतिक चक्र है।

इसके साथ ही अत्यधिक ठंडे इलाकों में बर्फ के तौर पर जमे पानी के पिघलने से नदियों में पानी का प्रवाह होता है।

यह पानी भी अंततः बहते हुए किसी न किसी समुद्र तक पहुंचकर भाप बनता है और फिर बादल बनकर बरसता है।

मंगल पर ऐसी कोई स्थिति नहीं होने के बाद भी वहां का पानी कहां गया, यही बड़ा सवाल बना है।

मंगल ग्रह पर चल रहे परीक्षणों से इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि वहां खरबों साल पहले पानी का विशाल भंडार था।

समय के साथ साथ यह जल वहां से गायब होता चला गया।

लेकिन अब भी वहां ग्रह की गहराइयों में बर्फ की शक्ल में पानी मौजूद है।

जबकि पानी का थोड़ा सा हिस्सा बादल बनकर वहां के वातावरण में है।

लेकिन बाकी पानी के बारे में अब तक कोई पक्का नतीजा नहीं निकल पाया है।

मॉस्को इंस्टिट्यूट ऑफ फिजिक्स एंड टेक्नोलॉजी तथा मैक्स प्लैंक इंस्टिटयूट फॉर सोलर सिस्टम के

संयुक्त शोध में वैज्ञानिकों ने इसका एक कंप्यूटर मॉडल भी तैयार किया है।

इसके माध्यम से वहां पानी के भाप बनने की प्रक्रिया को समझते हुए

वैज्ञानिक शेष जलभंडार के गायब होने के कारणों का पता लगाना चाहते हैं।

वैज्ञानिक इस रहस्य को समझना चाहते हैं कि जब पृथ्वी पर पानी मौजूद रह पाया तो

मंगल ग्रह से यह गायब कैसे हो गया है

प्रारंभिक गणना के मुताबिक इस पानी के गायब होने में शायद सूरज की किरणों की प्रमुख भूमिका रही है।

सतह से भाप बनकर आसमान पर आये वाष्पकण सूर्य की तेज पैरावैगनी (अल्ट्रावायोलेट) रोशनी के प्रभाव में आये थे।

शायद इसी तेज सूर्य करण की वजह से भाप या बादल में मौजूद पानी के कणों पर रासायनिक प्रतिक्रिया हुई।

इससे वे हाइड्रोजन एवं हाइड्रोक्साइल रेडिकल्सम तब्दील हो गये।

हाइड्रोजन बनने के बाद वह अंतरिक्ष में अपने हल्केपन की वजह से ऊपर चला गया।

शेष पानी नीचे आकर मंगल ग्रह के उत्तरी छोर पर अंदर चला गया

और बर्फ बनकर जम गया है। वैसे इस अनुमान से साथ ही यह बताया गया है कि

यह प्रक्रिया लाखों वर्षों तक चलती रही होगी। तब जाकर ग्रह का सारा पानी समाप्त सा हो चुका है।

प्रारंभिक शोध में इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि पृथ्वी की तरह ही इस मंगर ग्रह का ऊपरी वायुमंडल भी काफी ठंडा है।

यह ठंडक भी सूर्य और उसके बीच एक आवरण का काम करती रहती है।

लेकिन उसके सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगाने की धुरी कुछ अलग है।

इस धुरी की वजह से वह कई अवसरों पर सूर्य के बहुत करीब होता है।

शायद इसी दौरान पानी से हाइड्रोजन बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती होगी।

इस धुरी की गणना करते हुए वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि

गर्मी के मौसम में सूर्य से इसकी दूरी 260 लाख मील रह जाती है।

शायद इस दौरान वहां गर्मी का प्रभाव ज्यादा पड़ता है।

लेकिन वैज्ञानिक इन तमाम अनुमानों के साथ साथ अपने शोध को

और आगे बढ़ाते हुए किसी विज्ञान सम्मत निष्कर्ष पर पहुंचना चाहते हैं।



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