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विलुप्त प्रजाति की पक्षी अपने आप फिर से लौटी




  • वैज्ञानिक इसे विकास की पुनरावृत्ति की घटना मानते हैं

  • वीरान द्वीपों पर बसते हैं अबडबरा

  • मुर्गी के आकार के पर उड़ नहीं सकते

  • दो बार दुनिया से गायब हो चुके हैं पहले

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः विलुप्त प्रजाति की एक पक्षी भारत महासागर के इलाके में फिर से नजर आयी है।

पूर्व में वैज्ञानिकों का अनुमान था कि धरती पर से यह चिड़िया करीब एक लाख 36 हजार वर्ष पहले ही विलुप्त हो चुकी थी।

इस पक्षी के फिर से नजर आने के बाद वैज्ञानिक इस सिद्धांत पर काम कर रहे हैं कि

क्या विकास की प्रक्रिया की ऐसी पुनरावृत्ति प्रकृति अपने आप ही किया करती है।

ब्रिटेन की पोर्टमाउथ विश्वविद्यालय एवं नेचुरल हिस्ट्री म्युजियम ने दो बार

इसके विलुप्त होने की घटनाओं को दर्ज किया है।

इन दोनों कालों के बीच कई हजार वर्षों का अंतर भी दर्ज है।

वीडियो में देखिये इस विलुप्त प्रजाति की नई पीढ़ी को

इस प्रजाति की पक्षी को अलडाबरा कहा जाता है तो अपने बदलाव की वजह से अब उड़ नहीं सकती।

इस घटना के बारे में शोध करने वाले वैज्ञानिक मानते हैं कि किसी एक खास किस्म की

प्रजाति के पूर्व पुरुष की वजह से अलग अलग कालखंड में एक जैसी घटना घटित हो रही हैं।

पृथ्वी पर दो अलग अलग समय में इस पक्षी के विलुप्त होने के बाद

दोबारा लौटने की घटना यही साबित करती है।

भारत महासागर के एक द्वीप पर अब भी यह पक्षी मौजूद पायी गयी है।

पक्षी अपने पैरों के दौड़ तो सकती है लेकिन पंख होने के बाद भी अपने

शरीर के आकार की वजह से उड़ नहीं पाती।

कुछ लोगों का मानना है कि समय के साथ साथ इसने उड़ना की कला को ही भूला दिया है।

आकार में यह सामान्य मुर्गियों के जितना ही है।

वर्तमान में सका ठिका भारत महासागर के दक्षिण पश्चमी इलाके के मैडागास्कर के इलाके में है।

वहां के वीरान पड़े द्वीपों में इसे देखा जा रहा है।

विलुप्त होने के बचाने के लिए हर संभव उपाय भी किये जा रहे हैं।

वैज्ञानिक मान रहे हैं कि फिर से आबादी बढ़ने के बाद यह प्रजाति अन्य इलाकों तक भी धीरे धीरे फैल जाएगी।

इनमें से कुछ शायद आगे बढ़ते हुए कुछ अन्य द्वीपों पर पहुंच भी चुके हैं।

वैज्ञानिक शोध के मुताबिक इस प्रजाति की पक्षी पहले भी अलग अलग इलाकों की तरफ बढ़ती रही है।

लेकिन समुद्र के रास्ते आगे बढ़ने के क्रम में उनमें से अधिकांश समुद्री जीवन के शिकार बन गये हैं।

अफ्रीका के पश्चिम तक पहुंचने वाली इसी प्रजाति के कुछ पक्षियों को अन्य जानवरों के अपना भोजन बना लिया था।

वैज्ञानिक गणना के मुताबिक अपने इलाके में रहने वाली इस प्रजाति का समूल विनाश तब हुआ था

जब समुद्र ने पूरे द्वीप को ही निगल लिया था। यह घटना अभी से करीब एक लाख 36 हजार वर्ष पहले घटी थी।

उस दौर में तब की अनेक अन्य प्रजातियां भी इसके साथ ही नष्ट हो गयी थी।

इनकी बनावट का अध्ययन कर वैज्ञानिकों ने पाया है कि वे अब उड़ नहीं सकती

और उनके पैर भी इसी किस्म के बन चुके हैं।

पृथ्वी से गायब होने के बाद लौट आना वैज्ञानिकों के लिए अचरज का विषय

यह प्रक्रिया हजारों वर्ष के बदलाव के दौरान पैदा हुई है।

वैसे शोधकर्ता यह भी मान रहे हैं कि एक ही पूर्वज की वजह से

इस क्षेत्र में दो अलग अलग प्रजाति के पक्षी बने थे।

इनमें से एक उड़ने की क्षमता खो बैठा है। शोध के दौरान इस प्रजाति के पक्षियों का जो फॉसिल मिला है,

उससे भी उनके उड़ने की क्षमता से रहित होने का पता चलता है।

लेकिन पृथ्वी से पूरी तरह गायब होने के बाद फिर से उनका लौट आना भी एक प्राकृतिक चमत्कार माना जा रहा है।

अब वैज्ञानिक इसकी कड़ियों को जोड़ते हुए इसके मूल कारण तक पहुंचना चाहते हैं।

इसका खुलासा होने पर यह भी पता चल जाएगा कि क्या वाकई प्रकृति भी विकास की

प्रक्रिया को अपने माध्यम से दोहराती रहती है। जिस कारण पहले विलुप्त हो चुकी प्रजातियां नये सिरे से पैदा होती रहती हैं।

इस बारे में अधिक जानकारी मिलने पर पृथ्वी के प्रकृति के रहस्य को समझने के साथ साथ

यहां जीवन के विकास के क्रम को समझना भी और आसान हो जाएगा।

पता चल पायेगा कि किस प्रजाति का प्राण दरअसल अपने किस पूर्वज

के बदलाव के तहत इस धरती पर पैदा हुआ है।

जो प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं, उनके भी दोबारा इस धरती पर लौट आने की

अब कितनी संभावना है।

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