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समुद्र की गहराइयों में अब भी कायम है रेडियो विकिरण




  • परमाणु बम विस्फोट का असर कायम

  • 20वीं सदी के मध्य में हुए थे विस्फोट

  • समुद्री गहराई में भी बम विस्फोट का असर

  • अंदर मौजूद कार्बन 14 इंसानी कारणों से आया

नईदिल्लीः समुद्र की गहराइयों में अब भी परमाणु बम नुकसान पहुंचा रहे हैं।

समुद्र के अंदर किये गये परमाणु विस्फोटों का प्रभाव गहराई के इलाकों में मौजूद है।

वहां से वनस्पति भी इसकी चपेट में आ चुके हैं।

वैज्ञानिक शोध दल ने यह पाया है कि समुद्र के अंदर मौजूद कार्बन में भी इस रेडियो धर्मिता के गुण मौजूद हैं।

लिहाजा वहां की हरेक प्राकृतिक गतिविधियों पर यह रेडियो विकिरण प्रभाव डाल रहा है।

वैसे भी यह विज्ञान सम्मत तथ्य है कि परमाणु विस्फोट के इलाके में

काफी लंबे समय तक यह विकिरण मौजूद रहता है।

पानी में इसका नुकसान कम होने के अंदाजा से गहराई में इसके विस्फोट किये गये थे।

अब काफी समय बीत जाने के बाद भी जहां विस्फोट किये गये थे,

वहां रेडियो विकिरण के प्रमाण न सिर्फ मिले हैं बल्कि वे गहराई के जीवन को

अपने स्तर पर प्रभावित भी कर चुके हैं।

वैज्ञानिक यह देखकर हैरान है कि सामान्य विकिरण की समय सीमा

पार कर जाने के बाद भी समुद्र के अंदर इसके प्रभाव अब भी नजर आ रहे हैं।

समुद्र का सबसे गहरा इलाका माना जाता है मारियाना ट्रेंचसमुद्र की गहराइयों में अब भी कायम है रेडियो विकिरण




अब तक की जानकारी के मुताबिक मारियाना ट्रेंच समुद्र का सबसे गहरा इलाका है।

वहां की गहराई में ऐसे रेडियो धर्मी कार्बन के अंश उपलब्ध होने के वैज्ञानिक हैरान हो गये हैं।

समुद्री जीवन पर इस रेडियोधर्मिता का पहला प्रभाव शायद 1950 के आस पास हुआ था।

तब से अब तक हवा और पानी में होने वाले हर विस्फोट से समुद्री जीवन

किसी न किसी रुप में प्रभावित होता रहा है।

दूसरी तरफ वैज्ञानिक इस शोध के इस नतीजे से भी चिंतित हैं कि

इंसानी भूल की कितनी अधिक कीमत यह समुद्री जीवन चुका रहा है।

वहां की पारिस्थितिकी बदलने के बाद अंततः मनुष्यों पर भी इसका जबर्दस्त प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है।

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मारियाना ट्रेंच के अंदर इस किस्म के कार्बन पाये जाने का सीधा निष्कर्ष यही है कि

विकिरण युक्त पदार्थ समुद्र के अंदर पहुंचने के बाद एक के बाद एक कड़ी के तौर पर आगे बढ़ते चले गये हैं।

आम तौर पर समुद्र में पहले से मौजूद किसी अन्य पदार्थ को वहां की गहराई तक पहुंचने में एक सौ वर्ष

लग सकते हैं लेकिन यह विकिरण अत्यंत तेज गति से वहां जा पहुंचा है।

चीन के विज्ञान एकाडमी से जुड़े जियो केमिस्ट निंग वांग ने इस बारे में

अपने शोध प्रबंध में कहा है कि जमीनी सतह के जैसी समुद्र आचरण नहीं करता।

समुद्र के इन दोनों हिस्सों के बीच गहरा रिश्ता होता है।

खास कर समुद्री जीवन के उथल पुथल से दोनों ही हिस्से जल्दी प्रभावित होते हैं।

अब इस शोध के निष्कर्ष से यह साबित हो गया है कि इंसानी हरकतों का

प्रभाव समुद्र की गहराई में 11 किलोमीटर तक जा सकता है।

इसकी गति भी सामान्य समुद्री जीवन की गति से तेज है।

इसलिए हमें अपनी करनी के प्रति और सावधान हो जाना चाहिए।

समुद्र के बारे में चीन के विशेषज्ञों ने किया है यह शोध

इसी संस्थान से जुड़े दूसरे वैज्ञानिक वेइडोंग सून ने कहा कि ऐसा निष्कर्ष प्रत्याशित तो नहीं था

लेकिन इसके होने से साफ हो गया है कि यह खाद्य श्रृंखला की कड़ी में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

अब विकिरण प्रभावित इलाकों में पनप रहे समुद्री जीवन का अध्ययन करने की जरूरत है।

यह समुद्री जीवन ही यह बता पायेगा कि कम पौष्टिकता के क्षेत्र में ऐसे जीवन कैसे गुजर बसर कर रहे हैं।

हो सकता है कि वहां के जीवन ने इस कमी को पूरा करने के लिए कोई और रास्ता अख्तियार कर लिया हो।

वैज्ञानिकों ने बताया है कि वहां जो कार्बन पाया गया है वह कार्बन 14 श्रेणी का है।

यह सामान्य तौर पर प्रकृति में बहुत कम मौजूद है।

सौर किरणों के नाइट्रोजन से संपर्क होने पर यह कार्बन पैदा होता है।

1950 से 1960 के बीच जब परमाणु बम का विस्फोट बहुत ज्यादा किया गया तो यह कार्बन 14 प्रकृति में बढ़ गया।

बाद में इस किस्म के प्रयोग बंद कर दिये जाने से इसका मात्रा भी धीरे धीरे वायुमंडल में कम होने लगी।

लेकिन खाद्य श्रृंखला में जुड़कर यह अंततः समुद्र की उस गहराई तक जा पहुंचा

जहां सामान्य समुद्री गतिविधि को भी पहुंचने मे सैकड़ों वर्ष लगते हैं।

वैसे वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि समुद्र के नीचे टेक्टोनिक प्लेटों के घर्षण से

जो ऊर्जा उत्पन्न होती है वह भी कार्बन के अणुओं को बाहर से घेरकर

एक कार्बन बम की शक्ल में समुद्र की गहराई में दफन रखती है।

अब मरे प्राणियों को खाकर जिंदा रहने वाले जीवों में भी कार्बन 14 पाये जाने की वजह से

यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि यह दरअसल खाद्य श्रृंखला के माध्यम से ही

समुद्र की गहराइयों तक जा पहुंचे हैं।



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