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भाजपा के सामने वर्ष 2014 का प्रदर्शन दोहराने की कठिन चुनौती




नयी दिल्ली: भाजपा को केन्द्र में फिर से सत्तारूढ़ होने के लिए न केवल 2014 के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को

दोहराने बल्कि दक्षिणी तथा पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में मोदी लहर पैदा करने की चुनौती है।

पिछले चुनाव में भाजपा ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए अपने दम पर लोकसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल किया था।

वह 1984 के बाद लोकसभा में स्पष्ट बहुमत पाने वाली पहली पार्टी बनी थी।

उसने गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और दिल्ली में लोकसभा की लगभग सभी सीटों पर जीत हासिल की थी।

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 71 पर कब्जा किया था और बिहार में 22 सीटें जीत कर अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ का संदेश दिया था।

भाजपा ने गुजरात में सभी 26, राजस्थान में सभी 25 तथा उत्तराखंड की सभी पांच लोकसभा सीटों पर कब्जा कर लिया था।

मध्य प्रदेश की 29 में से 27, छत्तीसगढ की 11 में से दस और झारखंड की 14 में से 12 सीटों पर भाजपा प्रत्याशी निर्वाचित हुए थे ।

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में राजनीतिक स्थिति बदल गयी है।

इन राज्यों में भाजपा को बेदखल कर कांग्रेस ने सरकार बना ली है।

उत्तर प्रदेश , गुजरात , महाराष्ट्र , झारखंड और असम में भाजपा की सरकारें हैं और पार्टी के सामने वहां अपने चुनावी इतिहास को दोहराने की चुनौती भी है।

भाजपा बिहार में जनता दल (यू) और लोक जनशक्ति पार्टी के साथ तालमेल कर चुनाव लड़ रही है

जिसका विपक्षी महागठबंधन के उम्मीदवारों से मुकाबला है।

अलग झारखंड राज्य के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाला झारखंड मुक्ति मोर्चा

महागठबंधन से तालमेल कर चुनाव लड़ रहा है और उसने भाजपा के सामने कड़ी चुनौती पेश कर दी है।

उत्तर प्रदेश में पिछले चुनाव की तुलना में राजनीतिक समीकरण बदला हुआ है।

भाजपा के कई दिग्गज नेताओं के टिकट कटने तथा कुछ उम्मीदवारों के बदले जाने को चुनाव परिणामों से जोड़ा जा रहा है।

वर्षों तक एक-दूसरे की दुश्मन रहीं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी मिलकर मोदी लहर को रोकने

तथा अपने वोट बैंक को बचाने के लिए राजनीतिक महत्वाकांक्षा का बलिदान कर मिलकर एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं जो पिछले चुनाव में नहीं था ।

इन दोनों दलों के साथ राष्ट्रीय लोकदल भी जुड़ा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाराणसी से चुनाव लड़ेंगे लेकिन पार्टी के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी का टिकट काट दिया गया है ।

इसके अलावा पार्टी ने स्थानीय स्थिति को देखते हुये कुछ नेताओं का क्षेत्र बदल दिया है ।

कांग्रेस को पिछले चुनाव में उत्तर प्रदेश में दो सीटें मिली थी और इस चुनाव में वह सपा-बसपा -रालोद से अलग है।

उसने अपनी स्टार प्रचारक प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में उतार दिया है और उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का महासचिव बनाया है।

महाराष्ट्र में पिछले चुनाव में भाजपा और शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा था और राज्य की 48 सीटों में से भाजपा को 23 और शिवसेना को 18 सीटें मिली थी।

इस बार भी ये दोनों पार्टी मिलकर चुनाव लड़ रही है।

राज्य में उनकी सरकार है तथा उन्हें सत्ता विरोधी चुनौती से पार पाना होगा।

पिछले चुनाव की तरह कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने इस बार भी मिलकर चुनाव लड़ रहीं

और वे केंद्र और राज्य की सरकार को लेकर जनता में उपजी नाराजगी को भुनाने के प्रयास में हैं।

पिछले चुनाव में भाजपा ने कर्नाटक में अच्छा प्रदर्शन किया था और 28 में से 17 सीटें जीत ली थी ।

इस समय वहां कांग्रेस और जनता दल (एस) की सरकार है ।

कर्नाटक की राजनीति में अच्छी दखल रखने वाले भाजपा नेता अनंत कुमार का पिछले दिनों निधन हो गया था और बंडारु दत्तात्रेय को केन्द्रीय मंत्रिमंडल से हटा दिया गया था।

पिछले चुनाव में भाजपा ने हरियाणा की दस में से सात सीटें जीत कर अच्छा प्रदर्शन किया था।

भाजपा को असल चुनौती वामपंथी प्रभाव वाले प्रगतिशील राज्य केरल में मिल रही है

जहां वह अब तक लोकसभा सीट नहीं जीत पायी है।

तमिलनाडु में भी भाजपा का प्रदर्शन कभी अच्छा नहीं रहा है लेकिन अपनी पैठ बढ़ाने के लिए

इस बार राज्य में वह अन्नाद्रमुक के साथ तालमेल कर चुनाव लड़ रही है।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी भाजपा को कड़ी चुनौती दे रही है।

पिछले चुनाव में भाजपा को इस राज्य की 42 सीटों में से दो सीटें मिली थी।

ओडिशा भी भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण है जहां पिछले चुनाव में 21 सीटों में से उसे केवल एक मिली थी।

बीजू जनता दल इस राज्य में सत्तारुढ़ है और भाजपा इस राज्य में अपना सांगठनिक विस्तार का पिछले कई साल से प्रयास कर रही है।

पश्चिम बंगाल और ओडिशा में अपना प्रभाव बढ़ाने का भाजपा लगातार कोशिश कर रही है

और उसकी कोशिश इन राज्यों में अच्छा प्रदर्शन करने की है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश,

दिल्ली और उत्तराखंड में विपक्ष को खोने के लिए कुछ भी नहीं है।

इन राज्यों में सभी 94 सीटों पर भाजपा का कब्जा हैं।

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड में भी विपक्ष को खोने के लिए बहुत कुछ नहीं है

क्योंकि इनके 142 सीटों में से 124 पर भाजपा का ही कब्जा है।

जम्मू-कश्मीर की तीन सीटों पर पिछले चुनाव में भाजपा जीती थी।

वहीं भाजपा पर इन सीटों पर अपना कब्जा बरकरार रखने का दबाव है।

आन्ध्र प्रदेश में पिछले चुनाव में भाजपा को तीन सीटें मिली थी।

यहां तेलुगू देशम पार्टी की सरकार है और इसके प्रमुख चन्द्रबाबू नायडू ने

राजग से नाता तोड़ने के बाद से मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।

 



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