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रोजगार और बुनियादी सवाल पर चुप्पी भाजपा के लिए भारी




रोजगार इस देश के आम नागरिकों का सबसे बड़ा सवाल है।

इस सवाल पर भाजपा की तरफ से साफ साफ कुछ भी नहीं कहा जा रहा है।

इससे मतदाताओं और खास तौर पर युवा मतदाताओं के अंदर नाराजगी बढ़ रही है।

अखिल भारतीय स्तर पर किये गये एक सर्वेक्षण में यह तथ्य पहले ही सामने आ चुका है।

इसमें सभी लोकसभा सीटों के सभी विधानसभा क्षेत्रों के लोगों और खासकर युवाओं ने उनकी प्राथमिकता की राय ली गयी थी।

इसी सर्वेक्षण का नतीजा सार्वजनिक भी किया जा चुका है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक रोजगार ही आम जनता का मूल मुद्दा है।

युवाओं के लिए यह विषय शीर्ष प्राथमिकता पर है।

लेकिन चुनाव प्रचार में भाजपा के नेता इस सबसे अहम मुद्दे पर बोलने से बच रहे हैं।

वैसे बचना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है क्योंकि इस विषय पर भाजपा सरकार ने पहले झूठ बोलने का काम किया था।

बाद में जब सरकारी आंकड़ों का विश्लेषण किया तो असली राज सामने आ गया है कि

सरकार ने नौकरी के बारे में जो दावा किया था, वह आंकड़ों की हेराफेरी थी, सच्चाई नहीं।

लगे हाथ अब अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की वह रिपोर्ट भी सामने आ गयी है।

जिसमें यह कहा गया है कि नोटबंदी के बाद से देश में पचास लाख लोगों ने रोजगार गंवाये हैं।

देश में सुनहरे सपनों का वादा कर सत्ता में आयी भाजपा इस नोटबंदी को

पूरी तरह सफल बताने के बाद इस रिपोर्ट को खारिज नहीं कर पा रही है।

इस संस्थान की शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2016 के दिसंबर माह में

जब नोटबंदी हुई थी जो रोजगार के आंकड़े और वर्तमान रोजगार के आंकड़ों का यही अंतर है।

यह अंतर तब है जबकि भाजपा शासित राज्यों में अनेक अवसरों पर नौकरी के लिए

खास कैंप लगाकर हजारों को रोजगार देने का वादा किया गया है।

वैसे इस बात को याद रखा जा रहा है कि वर्तमान सरकार ने सत्ता में आने के पूर्व

हर साल दो करोड़ रोजगार देने का वादा किया था।

जिस पर अभी भाजपा की तरफ से चुप्पी है।

अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की रिपोर्ट को अब तक भाजपा ने खारिज करने का काम नहीं किया है।

देश की बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस फाउंडेशन के विशेषज्ञों ने

विज्ञान सम्मत तरीके से इसका मॉडल प्रस्तुत किया है।

जिसमें यह स्पष्ट है कि वर्तमान बेरोजगारों मे सबसे अधिक संख्या उन युवाओं की है

जो पहली अथवा दूसरी बार मतदान में भाग लेने जा रहे हैं।

21 से 24 साल के युवाओं की ही सबसे अधिक नौकरी इस अवधि में गयी है।

वर्ष 2016 से वर्ष 2018 के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन कर यह बताया गया है कि

इस सर्वेक्षण में देश के एक लाख साठ हजार परिवारों के पांच लाख 22 हजार लोगों से आंकड़ों लिये गये थे।

इसी आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गयी है।

रिपोर्ट यह भी कहती है कि सूचना तकनीक के क्षेत्र में अब नये सिरे से रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं

लेकिन यह देश की बेरोजगारी को कम करने के लिहाज से बहुत कम हैं।

सूचना तकनीक के क्षेत्र की छह कंपनियों ने इस पिछले वित्ती वर्ष में करीब एक लाख लोगों को नौकरी दी है।

फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक शहरी इलाके में युवा बेरोजगारी का प्रतिशत

करीब 34 है जबकि ग्रामीण इलाकों में यह बेरोजगारी अब 60 फीसद तक पहुंच गयी है।

इस भयावह स्थिति से निपटने के बारे में भाजपा कुछ नहीं बोल रही है।

प्रधानमंत्री के चुनावी भाषणों में यह मुद्दा नहीं आना भी युवाओं को निराश नहीं

भाजपा के प्रति नाराज भी करता जा रहा है।

रही सही कसर तो भाजपा के दूसरे नेता पूरी कर रहे हैं।

इस बार के चुनाव प्रचार में भाजपा नेताओं का आम जनता से जुड़े हुए मुद्दों के बदले

उन मुद्दों की चर्चा करना भी जनता को नागवार गुजर रहा है,

जो आम नागरिकों के दैनंदिन जनजीवन से कोई वास्ता नहीं रखते।

इतना तो तय हो चुका है कि यह चुनाव भाजपा के लिए दिनों दिन कठिन होता जा रहा है,

जिसकी असली वजह असली मुद्दों से मुंह मोड़ना ही है।

जिन नये मतदाताओं पर भाजपा को इस बार सबसे अधिक भरोसा है,

वह पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से अधिक स्मार्ट है।

लिहाजा उनकी प्राथमिकताएं भी पुरानी पीढ़ी से अलग हैं।

यह पीढ़ी स्मार्ट फोन के साथ ही पैदा हुई है।

ऐस में दूसरे तरीकों से उन्हें भरमाना पिछली पीढ़ी के लोगों के मुकाबले अधिक कठिन है।

हर नई सूचना की अपने स्तर पर परख करना इस पीढ़ी की विशेषता भी है।

जो असली और थोपे गये मुद्दों के बीच का फर्क अच्छी तरह समझ लेती है।



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