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नासा के उपकरणों से खगोल वैज्ञानिकों ने की एक और नई खोज




  • शनि की चंद्रमा पर मिथेन के गहरे झील

  • इस झील की गहराई एक सौ मीटर

  • कुछ ईंच वाले सतही झील भी हैं

  • कैसिनो अभियान से मिले थे आंकड़े

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः नासा के खगोल वैज्ञानिकों ने शनि ग्रह पर अपना शोध जारी रखा है।

इस ग्रह के बाहरी हिस्से में मौजूद चंद्रमाओं की पहचान पहले ही हो चुकी थी।

अब इनमें से एक चांद पर मिथेन के गहरे झील होने का पता चला है।

तरल अवस्था में मिथेन का होना भी अपने आप में बड़ी बात है।

वहां के वातावरण की स्थिति कुछ ऐसी है, जिसकी वजह से यह मिथेन वहां तरल अवस्था में है।

इस झील के बारे में प्रारंभिक आकलन यह है कि इसकी गहराई करीब एक सौ मीटर है।

नासा की जानकारी इस वीडियो में भी देखें

वैज्ञानिक इस उपलब्धि से इस लिए भी प्रसन्न हैं क्योंकि पूरे सौर जगत में अब तक सिर्फ दो ही स्थान ऐसे मिले हैं, जहां तरल पदार्थ मौजूद हैं।

इनमें से एक हमारी पृथ्वी है, जहां पानी मौजूद है, जो यहां के जीवन का आधार है।

इसके अलावा यह शनि की चंद्रमा है, जहां अब मिथेन होने का पता चला है।

शनि के इस चंद्रमा को टाइटन कहा जाता है।

नासा द्वारा भेजे गये यान कैसिनी का अभियान तो वर्ष 2017 में ही समाप्त हो गया था।

इस अभियान की समाप्ति के दौरान इस यान को जबरन शनि के इलाके में धकेला गया था।

इस दौरान इस यान ने जो आंकड़े उपलब्ध कराये थे, वे अब वैज्ञानिकों के शोध में काम आ रहे हैं।

वहां के ऐसे तरल झील में मिथेन के अलावा भी अन्य हाइड्रो कार्बन हैं अथवा नहीं, इसकी भी जांच चल रही है।

याद रहे कि इन्हीं हाइड्रो कार्बनों की वजह से पृथ्वी पर पेट्रोल एवं अन्य प्राकृतिक ईंधन हैं।

जो दरअसल हाइड्रोजन और कार्बन की रासायनिक प्रतिक्रिया से लंबे समय के बाद तैयार होते हैं।

वैज्ञानिकों को शनि की चंद्रमा में जिस झील के बारे में जानकारी मिली है वह यह दर्शा रहा है कि आस-पास क इलाके के पत्थर भी गलने के बाद इस झील में समा गये हैं।

दरअसल पृथ्वी पर भी झीलों के अलग बगल की मिट्टी और पत्थरों के इसी तरह टूटकर झील में जाने की प्रक्रिया होती रहती है।

नासा ने खोजा है वहां के कुछ झील जो सूख जाया करते हैं

इसके अलावा भी कई ऐसे इलाके वहां नजर आये हैं, जो बिल्कुल कम गहराई वाले झील हैं।

इनकी गहराई महज कुछ ईंचों की है, ज अक्सर ही सूख जाते हैं अथवा उनमें मौजूद तरल भाप कर उड़ जाता है।

वैसे शनि के इस चांद पर मौसम का बदलाव सात साल में एक बार होता है।

इससे अब धीरे धीरे उस शनि के चंद्रमा के गठन और आचरण के बारे में अधिक जानकारी मिलती जा रही है।

इस स्थिति की वजह से अब खगोल वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या वहां भी ऐसे तरह हाइड्रो कार्बन भाप बनकर उड़ते हैं और बाद मे उनकी बारिश भी होती है।

इसके जरिए वह पृथ्वी के जल चक्र के साथ उनके रिश्तों को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

इसके पहले नासा के ही पार्कर सोलर प्रोव ने सूर्य पर होने वाली प्लाज्मा किरणों की बारिश का पता बताया है।

इस चंद्रमा पर शोध करने वालों ने बताया है कि यह आकार में करीब 32 सौ मील व्यास का है।

उस लिहाज से यह पूरे सौर मंडल का दूसरा सबसे बड़ा चांद है।

इससे बड़े चांद की पहचान गुरु ग्रह यानी जूपिटर के चांद की हो चुकी है।

आकार में यह मंगल ग्रह से भी बड़ा है।

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