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भाजपा और कांग्रेस का यह मिला जुला खेल तो नहीं




भाजपा हर बार पर कांग्रेस को कोस रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस के निशाने पर सिर्फ भाजपा है।

दोनों ही जनता के असली विषयों पर बात करने से कतरा रहे हैं।

लिहाजा यह चुनावी सवाल खड़ा हो रहा है कि कहीं ये दोनों दल यानी भाजपा और कांग्रेस

किसी साजिश के तहत चुनावी लड़ाई को अपने बीच ही कैद करने की मुहिम में शामिल तो नहीं हैं।

भारतीय राजनीति में यह अनुभव तो अब आम लोगों को भी हो चुका है कि

यहां का खेल क्रिकेट अथवा फुटबॉल के जैसा हमेशा नहीं खेला जाता।

कई बार यह कैरमबोर्ड, बिलियर्ड अथवा शतरंज की तर्ज पर भी होता है।

जहां लोगों को चाल कुछ और नजर आती है और निशाना कुछ और होता है।

यह सवाल चुनावी राजनीति में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के अनेक राज्यों में

अब कांग्रेस और भाजपा क्षेत्रीय दलों के मुकाबले कमजोर नजर आने लगे हैं।

भाजपा और कांग्रेस दोनों क्षेत्रीय दलों से पिछड़ रहे हैं

कुछ राज्यों में तो कांग्रेस की स्थिति नंबर तीन अथवा नंबर चार या उससे भी पीछे की कतार वाली है।

ऐसे में जबरन फाइनल मैच में दो पसंदीदा टीमों को आगे बढ़ाने का यह मिलीभगत का खेल तो नहीं खेला जा रहा है।

जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं वैसे वैसे नेताओं की जुबान भी कड़वी होती जा रही है। यह कड़वी जुबान भी इसी खेल का हिस्सा हो सकती है।

इसका मकसद लोगों को इसी किस्म की बहस में उलझाये रखना है।

इसके लिए दोनों दल सोशल मीडिया का भी जबर्दस्त इस्तेमाल कर रहे हैं

जबकि इस बार सोशल मीडिया का अपेक्षित लाभ वर्ष 2014 के जैसा होता नजर नहीं आ रहा है।

जानकारों मान रहे हैं कि प्रथम बार वोट देने वाले मतदाताओं ने स्मार्ट फोन अपने बचपन से देखे हैं।

वे खुद भी इसका इस्तेमाल किसी अन्य बड़े से ज्यादा बेहतर तरीके से कर लेते हैं।

लिहाजा सोशल मीडिया में उनकी पैठ दूसरे मतदाताओं के मुकाबले अधिक है।

पिछले पांच वर्षो में इस आभाषी दुनिया के उतार-चढ़ाव और दांव-पेंच को वह ज्यादा बेहतर तरीके से समझ चुके हैं।

लिहाजा उनपर इस किस्म के प्रचार का कोई प्रभाव पड़ता नजर नहीं आता।

फिर भी सोशल मीडिया के बहाने में चुनावी जंग जीत लेने की कवायद में निश्चित तौर पर भाजपा दूसरों से काफी आगे है।

क्षेत्रीय दलों ने अब भी अपने पारंपरिक प्रचार के साधनों पर ज्यादा भरोसा रखा है।

क्षेत्रीय दल अब भी अपने पारंपरिक प्रचार और संसाधनों के भरोसे

ऐसे में जनता के बीच सीधी लड़ाई में भाजपा और कांग्रेस सिर्फ चंद राज्यों तक सिमटी हुई है।

चूंकि घटनाक्रम यह बता चुके हैं कि दोनों दल असली मुद्दों पर अपनी बात रखने से डर रहे हैं

और पिछले वादों पर भी चर्चा से उन्हें भय लगता है।

इसलिए एक दूसरे की गलती गिनाकर वे अपना नंबर बढ़ाने के खेल मे जुटे हुए हैं।

जमीनी हकीकत से दोनों दल अच्छी तरह वाकिफ होंगे, इस पर संदेह करने की भी कोई गुंजाइश नहीं है।

भाजपा ने त्रिपुरा के चुनाव में जिस पन्ना प्रमुख की रणनीति पर काम किया था, वह अब पूरे देश में लागू हो चुका है।

ऐसे में जनता के मिजाज का पता निश्चित तौर पर दोनों ही दलों को होगा।

फिर भी क्षेत्रीय दलों को छोड़कर एक दूसरे पर हमला कर वह एक नकली लड़ाई का जो माहौल बनाना चाहते हैं,

उसका अंततः क्या प्रभाव होगा, यह देश के मतदाताओं पर ही पूरी तरह निर्भर है।

भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा बड़ी चुनौती

उत्तर प्रदेश में निश्चित तौर पर भाजपा की लड़ाई सपा और बसपा गठबंधन से हैं।

जहां के समीकरण प्रियंका गांधी के आने से थोड़े बदले हैं।

पश्चिम बंगाल में भाजपा की लड़ाई तृणमूल से है।

दक्षिण के कई राज्यों में भाजपा को वहां के क्षेत्रीय दलों से दो दो हाथ करना है।

ऐसे में सिर्फ कांग्रेस पर निशाना साधने से क्या हासिल हो सकता है, इस प्रश्न का उत्तर तलाशा जाना चाहिए।

वरना हो सकता है इस गॉट अप (मिलीभगत) के मैच का असली नुकसान

इन दोनों ही दलों को हो क्योंकि वह जमाना बीत चुका है जब जनता नेताओं की कही हर बात को

अक्षरशः सत्य मान लेती थी।

अब नये दौर में हर बात की सच्चाई जांचने की परिपाटी है।

ऐसे में सोशल मीडिया अथवा इंटरनेट वह माध्यम है, जिसपर भाजपा अथवा कांग्रेस का कोई स्थायी कब्जा नहीं हैं।

आम जनता संदेह उत्पन्न होने की स्थिति में अपने तौर पर भी मुद्दों को जांच लेती है।

शायद इसी जांच की आदत की वजह से इस बार सोशल मीडिया का प्रचार जोर नहीं पकड़ पाया है।

जब मुकाबला क्षेत्रीय दलों से हो तो राष्ट्रीय स्तर पर सिर्फ एक दूसरे को विरोधी और दुश्मन बताकर

इस चुनावी लड़ाई को दो के बीच कैद करना का नतीजा क्या होगा, यह समझा जा सकता है।



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