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भाजपा अपनी उपलब्धियों पर चर्चा क्यों नहीं करती




भाजपा ने पिछले पांच साल में कुछ काम नहीं किया है, ऐसा तो उसका घोर विरोधी भी नहीं कह सकता।

और कुछ नहीं तो कमसे कम भाजपा की यह उपलब्धि है कि उसने एक स्थिर सरकार दिया है।

इस सरकार में आंतरिक मतभेद होने के बाद भी नेतृत्व का संकट कभी बाहर से नजर नहीं आया।

नाराज लोग इसे तानाशाही कहते हैं लेकिन यह कमसे कम यूपीए सरकार की

उस स्थिति से बेहतर है जब कोई भी साझेदार मुंह फुलाकर

अथवा हाथ मरोड़कर अपनी बात मनवाने की जिद करता रहता था।

शायद वर्ष 2014 का जनादेश उसी स्थिति के खिलाफ था,

जिसने जनता को उस दौर की सरकार से बहुत नाराज कर लिया था।

अब पांच वर्ष बीत चुके हैं और भाजपा अब भी अपने पांच साल का हिसाब देने के बदले जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ना चाह रही है,

वह उग्र राष्ट्रवाद का वह बुखार है, जिसे बाद में उतार पाना

खुद भाजपा के लिए ही कठिन हो जाएगा।

दरअसल इसके लिए भारतीय जनमानस की सामाजिक सोच को समझ लेना चाहिए।

भाजपा के बड़े नेताओं को जनता के मिजाज का पता होगा

ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं है कि दशकों से भारतीय राजनीति से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोगों को इसका एहसास नहीं होगा।

लेकिन उसके बाद भी वे जनता के इस मिजाज को भांप नहीं पा रहे हैं।

जनता की परेशानियों और प्राथमिकताओं पर रोशनी डालने के बदले खुद

प्रधानमंत्री और भाजपा के अन्य प्रचार आतंकवाद, पाकिस्तान, उग्र राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर चुनावी भाषण दे रहे हैं।

इससे राजनीतिक तौर पर भाजपा खुद अपना भरोसा खोती नजर आती है।

विपक्ष के राजनीतिक हमलों के बीच जिन मुद्दों को भाजपा के नेता उभारने की कोशिश कर रहे हैं,

उससे तो बेहतर है कि वह अपने पिछले काम काज का उदाहरण जनता के सामने पेश करे।

साथ ही वह अपनी भावी योजनाओं पर बात करें।

भाजपा फिर सूनामी पैदा कर पायेगी इसका कम संभावना है

वरना आतंकवाद और पाकिस्तान के खिलाफ जहर उगलने से जनता का मिजाज

फिर से नरेंद्र मोदी की सूनामी पैदा कर पायेगा, इसकी बहुत कम संभावना है।

इस मुद्दे पर भाजपा की एक बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि

उत्तर पूर्वी भारत के मिजाज से वाकिफ होने के बाद भी

उसने अपने नागरिकता संशोधन विधेयक से पांव वापस नहीं लिये हैं।

लेकिन उत्तर पूर्व की सीटों से देश में सरकार बनाने का रास्ता नहीं खुलता, यह तो भाजपा को भी पता है।

लिहाजा उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की जनता के लिए उसके पास क्या योजनाएं हैं,

इस पर बिना चर्चा के नये मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की जो अपील नरेंद्र मोदी कर रहे हैं, उसका अपेक्षित प्रभाव होना निश्चित नहीं है।

दरअसल भाजपा को यह समझ लेना होगा कि अब वह विपक्षी दल नहीं है। उसकी सरकार ही पांच वर्षों से इस देश में रही है।

ऐसे में उसे अपने काम-काज का हिसाब देना होगा, भारतीय लोकतंत्र में यही विशेषता है।

पिछले चुनावी घटनाक्रमों पर गौर करें तो यूपीए –एक का कार्यकाल

अपेक्षाकृत ठीक रहने की वजह से जनता ने कांग्रेस को अधिक सीट हासिल करने का मौका दिया था।

इसी वजह से दूसरी बार डॉ मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने थे।

कांग्रेस क्यों पिछला चुनाव हार गयी इससे भी सबक लेना चाहिए

लेकिन उसके बाद का कार्यकाल अत्यंत नकारात्मक रहा।

इस नकारात्मकता के बीच ही नरेंद्र मोदी खुद को एक बेहतर विकल्प के तौर पर स्थापित करने में कामयाब रहे।

जिसका नतीजा था कि जिसे लोकप्रियता आंका जा रहा था, वह चुनाव आते-आते एक सूनामी के विशाल लहर में तब्दील हो गया था।

भाजपा की तरफ से जो दूसरी गलती दोहरायी जा रही है, वह सोशल मीडिया के प्रचार और दुष्प्रचार है।

अपने साइबर सेल के माध्यम से विरोधियों के बारे में जो घृणा फैलायी जा रही है, उसे जनता अब जांचना सीख गयी है।

लिहाजा इस किस्म के दांव का इस बार अपेक्षित लाभ मिलने की कोई उम्मीद भी नहीं है।

जनता का मिजाज अन्य मुद्दों की तरफ टिका है

दरअसल भारतीय जनमानस बिल्कुल ही दूसरे मिजाज से संचालित होता है।

इस बात को समझने के बाद भी भाजपा फिर से इसी दांव को क्यों आजमा रही है,

यह तो उसके नेता ही बता सकते हैं।

इतना तो स्पष्ट है कि राम मंदिर, हरेक के बैंक खाते में पंद्रह पंद्रह लाख और रोजगार के सवाल पर भाजपा के पास अब कहने को कुछ नहीं बचा है।

लेकिन उसके ताजा संकल्प पत्र में कई ऐसी बातें हैं जो जनता पर छाप छोड़ सकती हैं।

वैसे भाजपा और कांग्रेस की लड़ाई का नतीजा यह निकला है कि देश के किसान फिर से राजनीति के केंद्र में लाये गये हैं।

अब देखना होगा कि चुनाव निपट जाने के बाद किसानों के प्रति जागा यह प्यार वाकई धरातल पर उतर पाता है

या सिर्फ हवा हवाई घोषणा बनकर अगले पांच साल के लिए फाइलों में कैद हो जाता है।



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