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ओरछा में मर्यादा पुरूषोत्तम राम को पुलिस देती है सलामी




ललितपुरः ओरछा दुनिया का संभवत: इकलौता ऐसा देव स्थान है

जहां सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पुलिस बाकायदा राजा रामचन्द्र को

सलामी देकर सम्मान का इजहार करती है।

मध्यप्रदेश की सीमा पर बुंदेलखंड के ललितपुर से 70 किलोमीटर

और झाँसी से महज 20 किमी की दूरी पर स्थित ओरछा विश्व का एक अकेला मंदिर है

जहां राम की पूजा राजा के रूप में होती है।

ओरछा धाम को दूसरी अयोध्या के रूप में मान्यता प्राप्त है।

राजा के तौर पर रहते हैं भगवान श्री राम

यहां पर रामराजा अपने बाल रूप में विराजमान हैं,

यह जनश्रुति है कि श्रीराम दिन में यहां तो रात्रि में अयोध्या में विश्राम करते हैं।

शयन आरती के पश्चात उनकी ज्योति भगवान हनुमानजी को सौंपी जाती है,

जो रात्रि विश्राम के लिए उन्हें अयोध्या ले जाते हैं।

शास्त्रों में वर्णित है कि आदि मनु सतरूपा ने हजारों वर्षों तक शेषशायी भगवान विष्णु को बालरूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या की।

भगवान विष्णु ने उन्हें प्रसन्न होकर आशीष दिया और त्रेता में श्रीराम, द्वापर में श्रीकृष्ण और कलियुग में ओरछा के श्रीरामराजा के रूप में अवतार लिया।

इस प्रकार मधुकर शाह और उनकी पत्नी गणेशकुंवर साक्षात दशरथ और कौशल्या के अवतार थे।

त्रेता में दशरथ अपने पुत्र का राज्याभिषेक न कर सके थे, उनकी यह इच्छा भी कलियुग में पूर्ण हुई।

श्रीरामराजा के अयोध्या से ओरछा आने की एक मनोहारी कथा है।

एक दिन ओरछा नरेश मधुकरशाह ने अपनी पत्नी गणेशकुंवर से श्रीकृष्ण की उपासना के इरादे से वृंदावन चलने को कहा, लेकिन रानी राम भक्त थीं।

उन्होंने वृंदावन जाने से मना कर दिया।

क्रोध में आकर राजा ने उनसे यह कहा कि अगर तुम इतनी राम भक्त हो तो जाकर अपने श्रीराम को ओरछा ले आओ।

इस पर रानी ने अयोध्या पहुंचकर सरयू नदी के किनारे लक्ष्मण किले के पास अपनी कुटी बनाकर साधना आरंभ की।

इन्हीं दिनों संत शिरोमणि तुलसीदास भी अयोध्या में साधना रत थे।

ओरछा में रानी को हुए थे राम के दर्शन

संत से आशीर्वाद पाकर रानी की आराधना दृढ से दृढतर होती चली गई, लेकिन रानी को कई महीनों तक रामराजा के दर्शन नहीं हुए।

अंतत: वह निराश होकर अपने प्राण त्यागने के उद्देश्य से सरयू की मझधार में कूद पडी।

यहीं जल की अतल गहराइयों में उन्हें रामराजा के दर्शन हुए।

रानी ने उन्हें अपना मंतव्य बताया। चतुर्भुज मंदिर का निर्माण रामराजा ने ओरछा चलना स्वीकार किया

लेकिन उन्होंने तीन शर्तें रखीं, एक- यह यात्रा पैदल होगी, दूसरी,

यात्रा केवल पुष्य नक्षत्र में होगी, तीसरी, रामराजा की मूर्ति जिस जगह रखी जाएगी

वहां से पुन: नहीं उठेगी।

खुशी से प्रफुल्लि होकर रानी गणेशकुंवर ने राजा नरेश मधुकरशाह को संदेश भेजा कि

वो रामराजा को लेकर ओरछा आ रहीं हैं।

राजा मधुकरशाह ने रामराजा के विग्रह को स्थापित करने के लिए करोडो की लागत से चतुर्भुज मंदिर का निर्माण कराया।

जब रानी ओरछा पहुंची तो उन्होंने यह मूर्ति अपने महल में रख दी।

यह निश्चित हुआ था कि शुभ मुर्हूत में मूर्ति को चतुर्भुज मंदिर में रखकर इसकी प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी।

भगवान श्री राम ने रानी के पास से मंदिर जाने से इंकार कर दिया था

लेकिन राम के इस विग्रह ने चतुर्भुज जाने से मना कर दिया।

कहते हैं कि राम यहां बाल रूप में आए और अपनी मां का महल छोडकर वो मंदिर में कैसे जा सकते थे।

भगवान श्रीराम आज भी इसी महल में विराजमान हैं और उनके लिए बना करोडो का चतुर्भुज मंदिर आज भी वीरान पडा है।

यह मंदिर आज भी मूर्ति विहीन है।

यह भी एक संयोग है कि जिस संवत 1631 को रामराजा का ओरछा में आगमन हुआ,

उसी दिन रामचरित मानस का लेखन भी पूर्ण हुआ, जो मूर्ति ओरछा में विद्यमान है

उसके बारे में बताया जाता है कि जब राम वनवास जा रहे थे तो

उन्होंने अपनी एक बाल मूर्ति मां कौशल्या को दी थी।

मां कौशल्या उसी को बाल भोग लगाया करती थीं।

जब राम अयोध्या लौटे तो कौशल्या ने यह मूर्ति सरयू नदी में विसर्जित कर दी थी।

यही मूर्ति गणेशकुंवर को सरयू की मझधार में मिली थी।

यहां राम ओरछाधीश के रूप में मान्य हैं।

रामराजा मंदिर के चारों तरफ भगवान हनुमान जी के मंदिर हैं।

छडदारी हनुमान, बजरिया के हनुमान, लंका हनुमान के मंदिर एक सुरक्षा चक्र के रूप में चारों तरफ हैं।

ओरछा की अन्य बहुमूल्य धरोहरों में लक्ष्मी मंदिर, पंचमुखी महादेव,

राधिका बिहारी मंदिर, राजामहल, रायप्रवीण महल, हरदौल की बैठक,

हरदौल की समाधि, जहांगीर महल और उसकी चित्रकारी प्रमुख है।



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