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पंद्रह मिनट और सबसे सस्ते में कोरोना जांच करेगा बांग्लादेश का किट

  • मात्र तीन डॉलर में तैयार होगी जांच विधि

  • शुद्धता पर संदेह पर 90 फीसद सही परिणाम

  • सामान्य पैथो लैब में ही हो सकेगी इसकी जांच

  • कोरोना से बचाव का सस्ता रास्ता खोजा बांग्लादेश ने

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पंद्रह मिनट और सबसे सस्ते में कोरोना की जांच की विधि पूरी दुनिया के

गरीब देशों के लिए राहत का संदेश लेकर आयी है। कोरोना के प्रकोप से बचने के लिए

जूझ रहे बांग्लादेश ने एक सस्ता और तुरंत परिणाम बताने वाला किट तैयार किया है।

वैसे इस किट की शुद्धता पर अन्य वैज्ञानिकों को संदेह है। इसी क्रम में भारत में भी एक

टेस्ट किट पहले ही तैयार हो चुका है। बांग्लादेश ने जो किट बनाया है वह मात्र तीन

डॉलर कीमत की है। आम तौर पर भारतवर्ष में कोरोना की जांच के लिए निजी

अस्पतालों में पांच हजार रुपये लिये जा रहे हैं। सिर्फ इसकी जांच के बाद भी रोगियों में

रोग होने के परिणाम गलत आने की आशंका जतायी गयी है। बांग्लादेश के वैज्ञानिकों

के एक दल ने देश की निरंतर बिगड़ती स्थिति को देखते हुए आनन फानन में इसे दिन

रात परिश्रम कर तैयार किया है। बांग्लादेश में भीड़ हटाने के लिए कई इलाकों में सेना

तक को उतारना पड़ा है। बांग्लादेश के इस सस्ते और पंद्रह मिनट में परिणाम बताने

वाले किट की गुणवत्ता पर संदेह होने के बाद भी देश की सरकार ने इसके ज्यादा

उत्पादन के आदेश जारी कर दिये हैं। सरकार का मानना है कि कमसे कम इसके

उपलब्ध होने से सीमित जांच सुविधा की कठिनाई झेल रहे देश के स्वास्थ्यकर्मियों को

कुछ तो राहत मिलेगी। बांग्लादेश के निजी अस्पताल कोरोना की जांच से लगातार

इंकार कर रहे हैं ताकि उनके अपने मरीजों के संक्रमित होने का खतरा टाला जा सके।

पंद्रह मिनट की इस विधि पर अन्य वैज्ञानिकों को संदेह

चीन में जो किट तैयार हुआ है, उसे दुनिया भर के देश मंगा रहे हैं। ऐसे में चीन के

आश्वासन के बाद भी बांग्लादेश को कोरोना से लड़ने की पहली मदद भारत से मिली है।

इसी वजह से अब बांग्लादेश अपने पड़ोसी भारत से हर जानकारी को साझा करता चल

रहा है। जिस किट के व्यापारिक उत्पादन में तीन डॉलर का खर्च आता है, समझा जाता

है कि और अधिक तादाद में उत्पादन होने पर इसकी लागत और कम हो जाएगी।

इस किट के काम करने के बारे में शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह शरीर में

कोरोना वायरस से लड़ने वाले श्वेत रक्त कणों की स्थिति का अध्ययन करता है। किट

के माध्यम से यह जांचा जाता है कि क्या शरीर में कोरोना से लड़ने के लिए यह सफेद

रक्त कण प्रतिरोधक तैयार करने लगे हैं। इससे तुरंत ही रिपोर्ट पाना आसान है। लेकिन

इसमें गलती की गुंजाइश भी है। अभी विभिन्न प्रयोगशालाओं में इसकी जांच की

पद्धति वायरस के जिनोम पर आधारित है। बांग्लादेश में इस सस्ते किट को बनाने वाले

वैज्ञानिक दल के प्रमुख डॉ बिजोन कुमार शील ने कहा कि इस विधि को डॉट ब्लॉट टेस्ट

का नाम दिया गया है। यह शरीर में कोरोना प्रतिरोधक के बनने की प्रक्रिया की जांच

करता है।

इस विधि से सिर्फ शरीर के अंदर बन रहे प्रतिरोधक का पता होता है

किसी भी वायरस का हमला होने पर शरीर के सफेद रक्त कण तुरंत ही प्रतिरोधक

बनाने का काम प्रारंभ कर देते हैं। डॉ शील के मुताबिक कोरोना वायरस के बारे में अब

तक जो जानकारी है, उसके मुताबिक यह नाक, मुंह और आंख से अंदर जाता है। यह

वायरस सबसे पहले इंसान के गले में जगह बना लेते हैं और वहां से एक प्रोटिन तैयार

करने लगते हैं। इस वायरस के बाहरी आवरण पर प्रोटिन की जो पर्त होती है, उसमें

वायरसन के डीएनए और आरएनए दर्ज होते हैं। इसी वजह से वायरस अपनी वंशवृद्धि

करता चला जाता है। एक समय जब शरीर की प्रतिरोधक शक्ति इसके आगे पराजित

हो जाती है तो इंसान अनेक किस्म की परेशानियों से पीड़ित हो जाता है। समय पर

ईलाज नहीं होने से कमजोर इंसान की मौत हो जाती है। बांग्लादेश की यह पंद्रह मिनट

तथा सस्ती और तुरंत परिणाम देने वाला किट सफेद रक्त कणों के द्वारा तैयार किये

गये प्रतिरोधक का अध्ययन करता है, जो यह बता सकता है कि कोरोना से लड़ने के

लिए क्या शरीर ने काम करना प्रारंभ कर दिया है। इसके लिए खून, लार और थूक की

जांच से चंद मिनटों में रिपोर्ट आ जाती है। डॉ शील के इस खोज को इसलिए गंभीरता से

लिया जा रहा है क्योंकि वर्ष 2003 में सिंगापुर में काम करने के दौरान उन्होंने सार्स की

जांच के लिए भी एक किट तैयार किया था। जिसे बाद में चीन ने भी मान्यता दी थी।

मंहगी जांच गरीब देश की जनता पर बोझ है

डॉ शील के दल में शामिल वैज्ञानिक मानते हैं कि जिस महंगे किट से जांच हो रही है,

उसके लिए जो अत्याधुनिक उपकरण लगते हैं, वे भी गरीब देशों में सहज ही उपलब्ध

नहीं है। एक आर टी पीसीआर किट की औसत कीमत 120 से 130 डॉलर के बीच है। इसे

जिन मशीनों में जांचा जाता है उनकी कीमत भी 15 हजार से लेकर 90 हजार डॉलर है।

इसलिए यह तीन डॉलर का किट पंद्रह मिनट का किट गरीब देशों में काम आ सकता है।

साथ ही इस किट के जरिए सामान्य खून जांच के प्रयोगशाला भी इसकी जांच कर

सकते हैं। खुद डॉ शील के मुताबिक वायरस का हमला होने के तीन दिन बाद से ही

प्रतिरोधक बनना प्रारंभ होता है। इसलिए अगर प्रतिरोधक बनने की प्रक्रिया प्रारंभ होने

के पहले ही जांच हुई तो रिपोर्ट गलत आ सकती है। उनके दल के सदस्य मानते हैं कि

जिस देश में सामान्य लोगों को न्यूनतम चिकित्सा भी उपलब्ध नहीं है, उनके लिए यह

व्यवस्था एक बेहतर विकल्प है। प्रतिरोधक बनने की प्रक्रिया प्रारंभ होने के बाद अगर

जांच की गयी तो इसकी रिपोर्ट 90 प्रतिशत सही होती है।


 

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