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125 मिलियन वर्ष पुराने डायनासोर का अवशेष मिला चीन में




  • इस डायनासोर की फॉसिल सोई हुई अवस्था में मिली

  • ज्वालामुखी विस्फोट से जमीन के अंदर से निकला

  • चीन के उत्तर पूर्वी प्रांत में शोध की उपलब्धि

  • खरगोश के जैसा गड्डा खोदकर रहता था यह

रांचीः 125 मिलियन वर्ष पुराना डायनासोर का अवशेष ज्वालामुखी विस्फोट जैसी स्थिति

की वजह से बाहर निकला। यह घटना चीन के उत्तर पूर्वी प्रांत की है। समझा जाता है कि

वहां के जियान स्तर के जमीन के प्लेट के आसपास यह कहीं दबा हुआ था। अंदर के दबाव

की वजह से वहां दबे पड़े सारे अवशेष जमीन के बाहर एक गुफा के रास्ते बाहर निकल

आये। इनकी पहचान और विश्लेषण के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इनकी

मौत भी शायद किसी ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से ही हुई थी क्योंकि जो फॉसिल्स

मिले हैं, उनमें ऐसे प्रमाण मौजूद हैं। शोधकर्ताओं ने इसे पोंपेई के ज्वालामुखी विस्फोट के

जैसी स्थिति करार दिया है।

चीन के लु जियातुन इलाके में हुए शोध के निष्कर्षों को रॉयल बेल्जियन इंस्टिट्यूट ऑफ

नेचुरल साइंस के विशेषज्ञ पास्कर फाएड ने भी परखा है और यह कहा है कि यह अवशेष

125 मिलियन वर्ष पुराने हैं। उन्होंने इसे पोंपेई कांड के जैसी घटना से हुई मौत करार दिया

है। उल्लेखऩीय है कि पोंपेई अपने समय का एक उन्नत इलाका था। इटली के कैपेन्या

प्रदेश में यह माउंट विशुवियस के करीब था। पहली शताब्दी में भी अधिक जनसंख्या और

व्यापारिक गतिविधियों के लिए यह उस दौर का एक प्रमुख शहर था। लेकिन उसे पहले

झटका 0063 ईस्वी के भूंकप ने लगा जबकि जब तक उसकी मरम्मत हो पाती 0079 इस्वी

के माउंट विशुवियस के भीषण ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से मूल शहर की पूरी तरह

लावा में ढक गया। बाद में उसके कुछ हिस्सों की खुदाई हुई है लेकिन उस काल का असली

शहर का अधिकांश हिस्सा लावा के अंदर ही दबा पड़ा है। कहा जाता है कि इस भीषण

ज्वालामुखी विस्फोट में वहां के अधिकांश लोग मारे गये थे।

125 मिलियन वर्ष पहले भी पोंपेई जैसी कोई घटना घटी थी

चीन के प्रांत में मिले 125 मिलियन वर्ष पुराने डायनासोर के अवशेष की कहानी भी कुछ

ऐसी ही है, जो ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से दब गये थे।  डायनासोर की इस नई

प्रजाति को चांगमियानिया लियानिनजेनेसिस नाम दिया गया है। चीनी परिभाषा में यह

परम निद्रा की स्थिति है। जो अवशेष मिला है, उसे साफ करने के बाद डायनासोर की

स्थिति भी कुछ ऐसी ही नजर आती है।

पहले से उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर वैज्ञानिक इसे क्रेटासिओस काल की

घटना मान रहे हैं। उस दौर के शाकाहारी प्राणी बहुत तेज दौड़ सकते हैं। यह उनकी पूंछ की

लंबाई और पैरों की स्थिति पर निर्भर था। जो अवशेष मिला है, वह करीब चार फीट लंबा है।

इस डायनासोर के अवशेषों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों के मुताबिक इसकी गरदन

और हाथ के सामने का हिस्सा बहुत छोटा है। उसकी रीढ़ और शेष शरीर के हिस्से बहुत

मजबूत पाये गये हैं। आकार और लंबाई की वजह से ही इसे बिल्कुल नई प्रजाति का

डायनासोर माना गया है क्योंकि ऐसा कोई नमूना इसके पहले नहीं मिला है।

ज्वालामुखी विस्फोट में नींद में ही मर गया था यह डायनासोर

वैज्ञानिकों को मुताबिक किसी ज्वालामुखी विस्फोट की भेंट चढ़ा यह डायनासोर अपने

सुरक्षित रहे अवशेषों की वजह से आसानी से पहचाना जा सका है। जिस परिस्थिति में

उन्हें एक गुफा से बरामद किया गया है, उसी के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है

कि किसी भीषण ज्वालामुखी विस्फोट की चपेट में आने की वजह से ही उसकी मौत हुई

होगी। शायद अपने ठिकाने के अंदर ही यह सोयी हुई अवस्था में ही लावा के अंदर दबा रह

गया था। इस फॉसिल में पंख होने के कोई निशान नहीं मिले हैं। समझा जाता है कि यह

डायनासोर उस काल की ऑर्निथोपॉड प्रजाति का है। उसका शरीर इस बात का प्रमाण है कि

यह बहुत ही तेज गति से दौड़ सकता था। उसके हाथों की संरचना से माना जा रहा है कि

वह इनकी मदद से अपने रहने के लिए गहरे गड्डे भी खोद सकता था। इसी एक गड्डे के

अंदर नींद में होने क दौरान ही वह ज्वालामुखी विस्फोट की चपेट में आ गया होगा।

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