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सामाजिक तौर पर सक्रिय लोगों को दिमागी बीमारी का कम खतरा







  • 50 से 70 साल तक अधिक सामाजिक रहने का फायदे

  • लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के वैज्ञानिकों का शोध

  • हर किस्म की गतिविधियों का हुआ विश्लेषण

  • दस हजार लोगों पर किया गया अनुसंधान

प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः सामाजिक तौर पर सक्रिय वयस्कों को भूलने जैसी दिमागी बीमारी का कम खतरा होता है। डिमेंसिया और अलजाइमर जैसी उम्रजनित बीमारियों का प्रभाव वैसे लोगों पर कम होता है जो आधी उम्र बीत जाने के बाद भी सामाजिक तौर पर ज्यादा सक्रिय बने रहते हैं।


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शोध का यह निष्कर्ष वर्ष 1985 से लेकर 2013 तक के अनुसंधान के बाद निकाला गया है। इस शोध को यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं ने पूरा किया है। इसके तहत करीब दस हजार लोगों ने भाग लिया था। उनकी तमाम परिस्थितियों को दर्ज करने के बाद उसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाल गया है। शोध के क्रम में यह पाया गया कि इस किस्म की दिमागी बीमारियों का प्रभाव ही आधी उम्र के बाद होना प्रारंभ होता है। इसके तहत दिमाग के कोष जब नष्ट होने लगते हैं तो धीरे धीरे यह क्रम तेज होता चला जाता है। दिमाग के कोष के नष्ट होने की इसी प्रक्रिया को सामाजिक गतिविधियां रोकने में प्रमुख भूमिका निभाती हैं।

सामाजिक तौर पर सक्रिय लोगों के मस्तिष्क सक्रिय रहते हैं




शोध कर्ताओं ने इनके बीच के रिश्ते की पहचान बारीक अनुसंधान से कर ली है। पूरी दुनिया के आंकड़े यह बताते हैं कि हर साल डिमेंशिया और अलजाइमर की चपेट में लाखों लोग आते जा रहे हैं। इस उम्र के लोगों को भूलने की बीमारी की वजह से परिवार के अन्य सदस्यों को भी परेशानी होती है और कई बार अप्रिय परिस्थितियों तक का सामना करना पड़ता है। दिमाग की इन बीमारियों का कोई स्थायी उपचार भी अब तक सामने नहीं आया है। इस वजह से इस शोध के निष्कर्ष को और महत्वपूर्ण माना गया है। अब शोध के आगे बढ़ाते हुए इसमें जेनेटिक्स और पारिवारिक पृष्टभूमि तथा भोजन की आदतों को भी शामिल कर लिया गया है। लोगों में इन दोनों किस्मों की बीमारी होने के कारणों पर काफी पहले से भी शोध होता आया है।

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पीएलओएस मेडिसिन की पत्रिका में प्रकाशित विस्तृत शोध प्रबंध के मुताबिक जो वयस्क सामाजिक तौर पर अधिक सक्रिय रहते हैं, उनमें दिमागी कोष के नष्ट होने का प्रभाव कम हो जाता है। साथ ही सामाजिक गतिविधियों में व्यस्त होने की वजह से दिमाग के कोष भी निरंतर सक्रिय होते रहते हैं। सक्रिय कोष की वजह से ही वे तेजी से नष्ट नहीं होते और इंसान दिमागी बीमारियों से बचा रहता है। शोध के निष्कर्ष के तौर पर बताया गया है कि लगातार अपने लोगो के बीच सक्रिय रहने वालों को इस श्रेणी की बीमारी का खतरा करीब 12 प्रतिशत तक कम हो जाता है। इन तमाम निष्कर्षों के आधार पर यह बताया गया है कि इंसान को 50 साल की उम्र से 70 साल की उम्र तक सामाजिक तौर पर अधिक सक्रिय रहना चाहिए।

दिमाग के नष्ट होने की गति को कम कर देता है यह अभ्यास

इस सक्रियता की वजह से उनके दिमागी कोष के नष्ट होने की गति काफी धीमी हो जाती है।




सामाजिक गतिविधियों में बनी सक्रियता की वजह से उनमें डिमेंशिया और अलजाइमर्स जैसी दिमागी बीमारी का प्रभाव भी कम हो जाता है।

दूसरी तरफ सामाजिक जीवन के कट जाने वालों का दिमाग तेजी से नष्ट होने लगता है।

निरंतर सामाजिक तौर पर निष्क्रिय रहने वालों के दिमागी कोष सुस्त और नष्ट दोनों होने लगते हैं।

जिस कारण भूलने की बीमारी जैसी दिमागी परेशानी खुद उन्हें तथा उनके परिवार और परिचितों के लिए भी परेशानी का कारण बनती चली जाती है।


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