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बीएचयू के मुस्लिम संस्कृत शिक्षक के पिता भजन गायक है




  • गौसेवा के साथ साथ पांच वक्त नमाज पढ़ते हैं रमजान खान
  • बीएचयू प्रशासन अपने प्रोफसर के साथ ही खड़ा
  • मीडिया का ध्यान गया तो बातें सामने आयीं
  • स्थानीय लोगों को इससे कोई परेशानी नहीं
प्रतिनिधि

जयपुरः बीएचयू के मुस्लिम शिक्षक के संस्कृत पढ़ाने पर काफी बवाल हो

रहा था। काफी दिनों के बाद वहां संस्कृत विभाग खुल पाया है। इस बीच

वहां पहली बार संस्कृत शिक्षक के तौर पर बहाल किये गये शिक्षक फिरोज

खान विरोध की वजह से घर लौट चुके हैं। लेकिन उनके लौट जाने के बाद

बीएचयू में भी छात्रों का एक वर्ग उनके समर्थन में उठ खड़ा हुआ है।

जयपुर के करीब ही रहता है बीएचयू के इस शिक्षक का परिवार

इन तमाम विवादों के बीच राजस्थान की राजधानी जयपुर से करीब

35 किलोमीटर की दूरी पर बांगरू गांव मैं उनके परिवार के प्रति पहली

बार मीडिया का ध्यान गया है। सामान्य जीवन जीने वाले इस परिवार

की दिनचर्या की जानकारी अब जाकर बाहर आयी है। पहली बार फिरोज

खान के पिता रमजान खान के बारे में जानकारी भी सार्वजनिक हुई है।

लेकिन मजेदार बात यह है कि उनके गांव और आस-पास के इलाकों में

यह बात पहले से ही लोगों को पता है। इस बात पर वहां के किसी व्यक्ति को

कोई हैरानी अथवा परेशानी नहीं है।

बीएचयू के मुस्लिम संस्कृत प्रोफसर के पिता रमजान खान नियमित तौर

पर गौ सेवा करते हैं। वह बांगरू के श्री रामदेव गौशाला चैतन्य धाम में यह

काम करते हैं। किसी पक्ष को उनके इस काम से कोई परेशानी नहीं है। दूसरी

तरफ वह पांचों वक्त नमाज भी पढ़ते हैं।

इन विवादों के उठ खड़े होने के बीच ही पिछले बुधवार को यहां आयोजित

एक भजन संध्या में वह खुद शामिल हुए। इससे देश और दुनिया को पहली

बार यह जानकारी मिल पायी कि दरअसल वह एक भजन गायक हैं।

इस दिन भी उन्हें हारमोनियम बजाकर गाते सुना गया। वहां के लोग

उनके भजन से पहले से वाकिफ हैं। लिहाजा उनकी दिनचर्या को लेकर

वहां किसी को हैरत अथवा आश्चर्य नहीं है।

बीएचयू के शिक्षक के परिवार से सभी परिचित

एक तीन कमरे के मकान में रहने वाले इस परिवार की जीवनचर्या आम

मध्यस्थ के जैसी ही है। इसी घर पर अपने परिवार के इसी माहौल के

बीच ही प्रो फिरोज पले बढ़े हैं। मीडिया में चर्चा होने के बाद पहली बार

इस बात की जानकारी मिल पायी है कि उनके पिता भी संस्कृत में शास्त्री

की उपाधि रखते हैं। इसी वजह से उन्होंने गौ सेवा के साथ साथ खुद ही

अनेक भजनों की रचना की है और उन्हें सुर भी दिया है। लेकिन इसके

बीच वह पांचों वक्त नमाज पढ़ना भी नहीं भूलते। उनके पड़ोसियों

अथवा उनके अपने रिश्तेदारों को इससे कोई परेशानी नहीं है।

उनके पिता ने कई अच्छी भजनो की रचना की है

पहली बार रमजान खान ने कहा कि जब उनके पुत्र का चयन प्रोफसर के

तौर पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में होने की जानकारी मिली तो

उन्हें हार्दिक प्रसन्नता हुई। बाद में जो कुछ हुआ वह दुखद है। मैं तो

आंदोलन करने वालों से सिर्फ यही कहना चाहूंगा कि पढ़ाई में मेरे बेटे

का संस्कृत ज्ञान कैसा है, इस पर ध्यान दें। और जो सवाल उठाये गये हैं,

उसके बारे में यही कहना चाहूंगा कि मेरे परिवार की दिनचर्या को गहराई

से समझने की कोशिश करें। रमजान खान को उम्मीद है कि बीएचयू

प्रशासन के उनके बेटे के साथ खड़े होने के बाद आंदोलनकारी भी सच को

जल्द समझ जाएंगे।

रमजान ने कहा कि इस जीवनचर्या के लिए उन्हें कभी कहीं भेदभाव का

सामना नहीं करना पड़ा। मेरी पहचान मेरी धार्मिक पहचान से अलग रही।

हम सभी यहां मिलकर रहते हैं। मैं खुद नमाज पढ़ने मसजिद जाता हूं।

लेकिन मैं मंदिर और अन्य धार्मिक स्थानों पर भी भजन गाने जाता

रहता हूं। यहां कभी किसी को इससे कोई परेशानी नहीं हुई है।

बात निकली तो लोग भी फिरोज और रमजान के पक्ष में आये

बात निकली तो वह खुलते ही चले गये। उन्होंने कहा कि दरअसल

संस्कृत उनके खून में बहता है। शायद इसी वजह से मैं बचपन से संस्कृत

के प्रति आकृष्ट था। मेरा बेटा भी बचपन से इसी गुण के साथ बड़ा हुआ।

वह खास तौर पर जिन भजनों के लिए इलाके में परिचित हैं, वे राम,

कृष्ण और भगवत के साथ साथ शिव पर आधारित हैं। कई अन्य

देवी देवताओं पर भी उन्होंने भजनों की रचना की है।

अब बीएचयू का विवाद खड़ा होने के बाद इलाके के हिंदू परिवार मजबूती

के साथ इस परिवार के साथ ही खड़ा है। इलाके के लोग वहां चल रहे

आंदोलन को गलत मानते हैं। उनके मुताबिक संस्कृत पढ़ाने के लिए

किसी का हिंदू होने की शर्त की बात ही गलत है।

जो युवक उच्च शिक्षित है और योग्यता रखता है, उसे इस तरीके से बयान

से दबाया नहीं जा सकता है। जिसने अपनी योग्यता पर नौकरी पायी है,

उसे सिर्फ मुसलमान होने की वजह से दबाना सरासर गलत है। पास

के रघुनाथ घाम के साधु सौरभ राघवेंद्राचार्य ने कहा कि इस किस्म

की असहिष्णुता को रोका जाना चाहिए। यह देश को बर्बादी की तरफ

ले जा रहा है। दूसरे मंदिर के पूजारी मोहन लाल शर्मा ने कहा कि इतने

दिनों से इलाके के लोग रमजान के भजनों को सुनते आ रहे हैं। हमलोगों

को तो कभी यह फर्क महसूस नहीं हुआ कि वह मुसलमान है तो जहां

योग्यता ही पैमाना है, वहां इस किस्म के विरोध का असली राज क्या है।



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