दुनिया में घट रही है चाहने वालों की संख्या

बुंदेले शूरवीरों की लोक शौर्य गाथा आल्हा के अस्तित्व पर संकट  

महोबा : मातृ भूमि की आन, बान और शान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर
कर देने वाले 12वीं सदी के बुंदेले शूरवीरों की लोक शौर्य गाथा आल्हा पर अस्तित्व का संकट छाने लगा है। इंटरनेट और यू ट्यूब के माध्यम से दुनिया मे अपना वजूद कायम करने के
बावजूद इसके चाहने वालो की घट रही संख्या और अल्हैतों (आल्हा गायकों) की नई
पीढ़ी तैयार न होने से अब यह अपने ही वतन में गुमनामी का शिकार हो चला है।
बारिश की फुहारों के बीच शाम का धुंधलका गहराने ओर पंछियो के अपने घरौंदो
की ओर वापसी करने के साथ ही गांव की चौपालों में जब इसकी महफिल जमती और
अल्हैत ढोलक की थाप पर अपनी तान छेड़ते तो इसके शौकीन अपने सारे कामकाज छोड़ खिंचे चले आते थे। इसमें 12वीं शताब्दी के महोबा के चंदेल साम्राज्य के सेनानायकों आल्हा
और ऊदल की अप्रतिम शूरवीरता का वर्णन है जिसे उन्होंने अपने राज्य की ओर
से लड़े गए विभिन्न युद्धों में प्रदर्शित किया। इतिहासकारों द्वारा आल्हा में 52 लड़ाईयां वर्णित बताई जाती है। इनमें वर्ष 1182 में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान की सेना के साथ हुए कीरत सागर का युद्ध प्रमुख है। पृथ्वीराज चौहान के राजकवि चंद्र बरदाई ने रासो ग्रंथ और चंदेल राजकवि
जगनिक ने महाकाव्य आल्हा की रचना की।
रियासती सैनिक सामूहिक गान कर इसका आनंद लेते थे।
स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारियो चंद्र शेखर आजाद, भाई परमानंद, दीवान
शत्रुघन सिंह आदि ने तो इसे अपनी दिनचर्या में ही सम्मिलित कर रखा था।
द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों में जोश का संचार करने के लिए आल्हा
की पुस्तकें कानपुर के श्री कृष्ण पुस्तकालय से मांगा कर वितरित कराई गई थी।
जगनिक शोध संस्थान के सचिव डॉ वीरेंद्र निर्झर ने बताया कि गुरु-शिष्य परंपरा से
एक स्वर से दूसरे स्वर की यात्रा करते हुए आल्हा ने लोकप्रियता के कई मुकाम तय किये है।
यह पूरे देश में अलग-अलग शैलियों में गाया जाता है।
बुंदेलखंडी शैली में वाद्ययंत्रों का अधिक समावेश न होने और ओज का पुट अधिक
होने से यह श्रोताओं मेंं विशेष लोकप्रिय है। लेकिन इसके पारंपरिक गायक
घरानों से नए गायक न आने के कारण अब यह शैली लुप्तप्राय होने को है।

 

 

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