प्रसार भारती में विदेशी कंपनियों के बहाने अपना हित साधने का धंधा

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 विशेष प्रतिनिधि

नईदिल्ली : आकाशवाणी भी प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया सपनों को साकार करने के रास्तों में अड़ंगे लगा रहा है। यहां के अधिकारी निजी हित साधने के चक्कर में देश पूंजी को चूना लगा रहे हैं। पूर्व में ऑल इंडिया रेडियो के बाद नामकरण से आकाशवाणी को अब भी देश के सबसे बड़े ब्रॉडकास्टर का दर्जा हासिल है। इस स्थिति से देश और प्रसार भारती को फायदा पहुंचाने के बदले वहां के अधिकारी दूसरे ही धंधे में जुटे हुए हैं।

अधिकारियों ने एक विदेशी कंपनी से 140 करोड़ में रेडियो प्रसारण का एक सॉफ्टवेयर खरीदा है। जिसके इस्तेमाल के बाद आकाशवाणी के ही लोग इसे घटिया दर्जे का मान रहे हैं। इसलिए समझा जा रहा है कि इस खरीद में भी चंद लोगों को निजी लाभ पहुंचा है। यह स्थिति तब है जबकि इस सॉफ्टवेयर को खरीदने के पहले ही देश में विकसित एक ऐसा ही सॉफ्टवेयर पहले से ही बेहतर तरीके से कार्यरत था। प्रधानमंत्री द्वारा मन की बात के प्रसारण का बहाना बनाकर अनाप शनाप पैसे खर्च करने की दुहाई देने वाले अधिकारियों की यह गड़बड़ी पकड में आने के बाद भी इस दिशा में अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

मामले की छान-बीन से पता चला है कि देश में वर्ष 2006 में देश के ही इंजीनियरों ने एक तकनीक विकसित की थी। आकाशवाणी के तिरुअनंतपुरम में कार्यरत अभियंताओं ने एआइआर वर्चुअल स्टूडियो वर्सन 2 के नाम से एक पद्धति का विकास किया था। आकाशवाणी के एक वरीय अधिकारी के मुताबिक इसके इस्तेमाल के हर पहलु की जांच के बाद इसे बेहतर पाया गया और देशभर के करीब एक सौ स्टेशनों में इसे चालू किया गया। आकाशवाणी की हर जरूरत को ध्यान में रखते हुए ही इस पद्धति को विकसित किया गया था।

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इस स्टूडियो के विकसित और जांच में पास होने के बाद अनेक लोगों को इसका प्रशिक्षण भी प्रदान किया गया। उस वक्त यह योजना बनायी गयी थी कि आकाशवाणी के सभी केंद्रों में इसी तकनीक को लागू किया जाएगा। अज्ञात कारणों से स्वदेश में तैयार और परीक्षण में पास इस तकनीक को सारे देश में लागू करने से रोक दिया गया। सब कुछ ठीक होने के बाद अचानक वर्ष 2013 में दिल्ली के स्थानीय कंपनी से एक नया साफ्टवेयर खरीदा गया। जानकार मानते हैं कि 140 करोड़ रुपये का जो भुगतान इस खरीद के लिए किया गया, वह वास्तविक बाजार मूल्य से कई गुणा अधिक है। वैसे अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि स्वदेशी तकनीक पर संचालित होने वाली व्यवस्था को किस आधार पर रोका गया और उसके बदले विदेशी कंपनी के नाम पर 140 करोड़ रुपये खर्च किये गये।

फ्रांस की कंपनी नेटिया के स्थानीय एजेंट के माध्यम से यह खरीद की गयी। लेकिन इस खरीद और स्वेदशी तकनीक पर आकाशवाणी के इंजीनियरों द्वारा विकसित तकनीक को दरकिनार करने का औचित्य अब तक स्पष्ट नहीं किया गया है। इस पद्धति की खरीद होने के बाद इसके पीछे छिपे कारणों का एक एक कर खुलासा होता जा रहा है। दिल्ली की कंपनी प्रोग्रेसिव टेक्नोलॉजिस ने फ्रांस का यह साफ्टवेयर आकाशवाणी को उपलब्ध कराया है।

एक तरफ देश में मेक इन इंडिया के लिए हर स्तर पर प्रयास हो रहे हैं तो दूसरी तरफ आकाशवाणी में विदेशी कंपनी के नाम पर इस किस्म की लूट मची हुई है। इस लूट में कौन कौन असली हिस्सेदार हैं, इसका खुलासा तो मामले की जांच के बाद ही हो पायेगा। तय है कि अत्यधिक कीमत पर इस संचालन विधि की खरीद के पीछे आकाशवाणी के ही कुछ लोगों का हाथ अवश्य है।

चालन विधि की खरीद के पीछे आकाशवाणी के ही कुछ लोगों का हाथ अवश्य है।

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