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दवा के क्षेत्र में अब डिजिटल अनुसंधान का जमाना खरबों का पूंजीनिवेश







  • कई कंपनियां शोध पर कर चुकी हैं बड़ा खर्च
  • पारंपरिक दवा उद्योग से ज्यादा सटीक
  • कारोबार का सामान्य खर्च भी बहुत कम
  • रोगी विशेष के लिए खास तौर पर दवा
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः दवा के क्षेत्र में शीघ्र ही हमें नई बात सुनने और समझने को मिल सकती है।

यह बदलाव दवा के स्वरुप का है।

बदलते युग और बाजार की मांग को समझते हुए अब डिजिटल दवा का काम तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।

इसके प्रारंभिक चरण में हम घर बैठे अपनी दवा मंगाने की सुविधा को देख रहे हैं।

भारत में भी कई कंपनियां इस किस्म की दवा आपूर्ति का काम करने लगी हैं।

इनका कारोबार का दायरा भी तेजी से फैलता जा रहा है।

किसी एक दवा दुकान पर अपनी दवा उपलब्ध नहीं होने की वजह से लोगों को कई दुकानों में भटकना पड़ता है।

इसके बेहतर और सार्थक विकल्प के तौर पर घर बैठे दवा की आपूर्ति का कारोबार निश्चित तौर पर

दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद है।

इससे पांरपरिक दवा उद्योग को कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा रहा है।

साथ ही दवा दुकानों के आधारभूत खर्च की वजह से उनके मुनाफे भी कम होते जा रहे हैं।

दवा के क्षेत्र में डिजिटल दवा दरअसल यही पर समाप्त नहीं होती। यह इस नये आयाम का प्रवेश द्वार भर है।

अभी कुछ दिन पहले ही दवा के क्षेत्र में डिजिटल प्रयोग के विषय पर हावर्ड विश्वविद्यालय के

हावर्ड स्कूल ऑफ मेडिसीन में एक सम्मेलन का आयोजन भी इसी मुद्दे पर किया गया था।

दरअसल डिजिटल दवा की विभिन्न संभावनाओं को तलाशने और उन्हें क्रमबद्ध करने का काम चलने के दौरान

इससे जुड़े लोग और कंपनियां कहां क्या कुछ चल रहा है, इस बारे में भी आपस में विचारों का

आदान प्रदान करने लगे हैं।

वैज्ञानिक मानते हैं कि यह व्यवस्था चिकित्सा पद्धति को बदल देगा

इससे जुड़े लोग और वैज्ञानिक मानते हैं कि डिजिटल दवा का विकास पूरी चिकित्सा पद्धति को बदलकर रख देगा।

इसके माध्यम से भविष्य में हर रोगी को उसकी निजी जरूरत के हिसाब से दवा उपलब्ध करायी जा सकेगी,

जो अपने आप में एक बड़ी बात होगी।

वर्तमान में एक ही रोग के लिए सभी रोगियों को एक ही दवा दी जाती है।

लेकिन शोध में इस बात की पुष्टि पहले ही हो चुकी है कि हर मनुष्य की जेनेटिक संरचना अलग अलग होती है।

इसलिए अगर किसी खास की जरूरत के लिहाज से उसे दवा दी जाए तो उसका ज्यादा लाभ हो सकता है।

डिजिटल दवा का कारोबार इसी दिशा में बढ़ रहा है।

हावर्ड में जब यह सम्मेलन आयोजित किया गया तो उसमें पिछले साल के मुकाबले दोगुने लोग शामिल हुए।

इसी से स्पष्ट हो गया कि अनेक कंपनियों का ध्यान इस नये आयाम की तरफ आया है

और नई कंपनियां भी इसके अनुसंधान में पूंजी निवेश कर चुकी हैं।

दवा के क्षेत्र में डिजिटल प्रयोग से जुड़े विशेषज्ञ इससे आगे के काम को बहुत संभलकर और धीरे धीरे बढ़ाना

चाहते हैं क्योंकि इसमें रोगी के रोग के विश्लेषण और दवा निर्धारित करने की ऑटोमैटिक व्यवस्था को

पूरी तरह सुरक्षित करना जरूरी है।

इसके लिए आवश्यक है कि रोग विश्लेषण के लिए हर छोटी बड़ी बातों का पूरा ख्याल रखा जाए।

ताकि गलती की कोई गुंजाइश नहीं रहे।

उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि इस नई किस्म की स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अब तक करीब 34 खरब डॉलर

निजी पूंजी निवेश हो चुका है। पिछले वर्ष में यह पूंजी निवेश मात्र 9.5 खरब डॉलर का था।

इसी एक आंकड़े से स्पष्ट हो जाता है कि यह दवा के क्षेत्र में डिजिटल प्रोद्योगिकी के इस्तेमाल के प्रति

किस गति से कंपनियों का आकर्षण बढ़ता जा रहा है।

दवा के क्षेत्र में जानकार संभलकर आगे बढ़ने के पक्ष में

वैसे सम्मेलन के दौरान ही यह स्पष्ट हो गया कि पूंजी निवेश करने के बाद भी इस पूंजी की वापसी के बारे में अभी कोई स्पष्ट राय नहीं है।

लेकिन जिन्होंने पैसे लगाये हैं, उन्हें अच्छी तरह इस बात का एहसास है कि रातोंरात यह पैसा वापस नहीं लौट सकता।

लेकिन इस बाजार के दिन दोगुना और रात चौगुना बढ़ने की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता।

इस वजह से पूंजी निवेशक अभी इस उद्योग में धैर्य के साथ ही पैसा लगा रहे हैं।

उन्हें अपनी पूंजी की त्वरित वापसी की कोई चिंता भी नहीं है।

यह स्पष्ट हो गया है कि दवा के क्षेत्र में इस कारोबार में अधिकांश पैसा बड़ी कंपनियों का ही लगा है।

इस नये कारोबार में वैसी कंपनियों का ज्यादा निवेश हुआ है जो वर्तमान में दो गुणा रफ्तार से अपना राजस्व बढ़ाने वाली कंपनियां हैं।

लेकिन इस कारोबार में छोटे निवेशकों अथवा निजी प्रयासों के शामिल होने की वजह से

इन कंपनियों को एकाधिकार के कारोबार की छूट नहीं मिलेगी, यह भी स्पष्ट हो चुका है।



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