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झारखंड के कोयले के कारोबार में कितनों के चेहरे काले




झारखंड के कोयले के कारोबार पर नये सिरे से कई चेहरे लटके नजर आने लगे हैं।

दरअसल फिर से एक महत्वपूर्ण और बड़ी कोयला परियोजना पर सीबीआई की छापामारी की वजह से

इससे जो लोग प्रभावित हो सकते हैं, उनके ही चेहरे लटके हैं।

लेकिन बार बार कोयले की हेराफेरी के मामले में सीबीआई की जांच के बाद भी अगर कोयला कंपनियां

इस चोरी और भ्रष्टाचार को नहीं रोक पा रही हैं तो यह भी माना जाना चाहिए कि किसी न किसी रुप में ऊपर से भी इस अनैतिक कारोबार को संरक्षण मिलता है।

कोल इंडिया के इतिहास में सिर्फ एक बार कोल इंडिया का अध्यक्ष सस्पेंड हुआ था।

उस दौरान देश के कोयला मंत्री खूंटी के पूर्व सांसद कड़िया मुंडा थे।

पूरे देश में इस पर बवाल होने के बाद भी अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्री होने की वजह से

कड़िया मुंडा पर उनकी तरफ से कोई दबाव नहीं डाला गया।

अगर यही स्थिति कोयला कंपनियों के कारोबार पर बड़े अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराने की कार्रवाई होती

तो शायद कोयला कारोबार में इतने किस्म के भ्रष्टाचार पनप ही नहीं पाता।

झारखंड के कोयले की अनैतिक कमाई के अनेक हिस्सेदार

अब वास्तविकता यही है कि इस कोयला के कारोबार में नक्सली, पुलिस और राजनेता एक ही मंच पर खड़े नजर आते हैं।

सीसीएल की आम्रपाली कोल परियोजना में हुई सीबीआई जांच झारखंड के कोयले के कारोबार की इस कड़ी का सबसे ताजा नमूना भर है।

सीसीएल की आम्रपाली एवं मगध कोल परियोजना में लगातार सीबीआइ की जांच जारी है।

अगर वहां गड़बड़ी की जांच सीबीआई अथवा एनआइए कर रही है तो सीबीआई का सतर्कता विभाग

क्या कुछ कर रहा है, यह सवाल भी अब बड़े अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए।

वर्तमान में सरकारी संस्थानों की एक सबसे बड़ी गड़बड़ी जिम्मेदारी से भागना भी है।

किसी बड़ी गलती अथवा गड़बड़ी के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराने की वजह से भी

इस किस्म की गड़बड़ी में शामिल नहीं होने वाले अधिकारी भी आंख बंद रखने की गलती तो करते ही रहते हैं।

दरअसल आम्रपाली कोल परियोजना में सीसीएल के अधिकारियों के द्वारा पिछले पांच वर्षों से कोयले की क्वालिटी में हेरफेर कर केन्द्र सरकार एवं कोयला मंत्रालय को करीब 100 करोड़ रुपये से अधिक राजस्व नुकसान बात सामने आ रही है।

सीसीएल आरओएम कोयला खरीदनेवाले प्लांट को एसएम कोयले सप्लाई करती थी।

जिससे सरकार को प्रति टन लगभग 400 रुपये का नुकसान होता था।

प्रति टन 400 रुपये प्लांट तथा अधिकारियों के बीच बंदरबांट होती थी।

परियोजना से संबंधित दस्तावेजों को भी सीबीआई के द्वारा खंगाला गया है।

सीबीआइ की टीम कोल उत्पादन और डिस्पैच में गड़बड़ी की जांच भी कर रही है।

वहीं, टेरर फंडिंग से संबंधित दस्तावेज की भी बारीकी से जांच की जा रही है।

अगर बार बार जांच हो रही है तो कार्रवाई करना कंपनी की जिम्मेदारी है

सीबीआइ की टीम शुक्रवार को अचानक सीसीएल की आम्रपाली कोल परियोजना पहुंची थी।

इस टीम में आधा दर्जन अधिकारी शामिल थे।

वे सुबह ग्यारह बजे सबसे पहले आम्रपाली स्थित पीओ कार्यालय पहुंचे थे।

इसके बाद मगध कोल परियोजना गये. आम्रपाली कोल परियोजना में वे पांच घंटे तक रुके और कोल स्टॉक से संबंधित दस्तावेज खंगाले।

उल्लेखनीय है कि आम्रपाली व मगध कोल परियोजना में जांच एजेंसियों द्वारा कई प्रकार की जांच चल रही है।

नये सिरे से कोयला के कारोबार से टेरर फंडिंग के मामला जुड़ने की वजह से इसे आसानी से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

लेकिन असली सवाल सरकारी एजेंसियों द्वारा ऐसे मामले की जांच में मिलने वाले तथ्यों को सार्वजनिक होने से बचाना भी होता है, जो आज के दौर में गलत है।

इससे चोरी करने वालों को धीरे धीरे सीनाजोरी करने तक की छूट मिल जाती है।

यह काम बिना राजनीतिक संरक्षण के नहीं हो सकता, यह सभी जानते हैं।

राजनीतिक संरक्षण की स्थिति भी स्पष्ट करे जांच एजेंसियां

यहां तक कि राज्य सरकार की जांच एजेंसियों के पास भी कोयला के अवैध कारोबार के संबंध में जो कार्रवाई होनी चाहिए थे, उन पर लगातार पर्दा डाला जाता है।

यह पर्देदारी तब अधिक होती है जब पुलिस अथवा प्रशासन का कोई अधिकारी इन आरोपों के घेरे में आता है।

इस मुद्दे पर झारखंड के लोकायुक्त कार्यालय में मौजूद दस्तावेज भी इस बात की गवाही देते हैं कि

कोयला के अवैध कारोबार में संलग्न अधिकारियों को भी स्पष्ट तौर पर राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है।

इसके एक नहीं अनेकों उदाहरण हैं। हम अक्सर ही पुलिस की कार्रवाई में साइकिल पर कोयला लादकर लाते लोगों के पकड़े जाने की खबरें तो देख लेते हैं।

लेकिन ट्रकों के पकड़े जाने के बाद उस ट्रक पर किसका कोयला लदा था, किस खदान से निकला था

और कहां जा रहा है, इन तीनों मुद्दों के लिए जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार होते हुए कभी नहीं देख पाते।

इसी छूट का नतीजा है कि झारखंड के कोयले के नक्सलियों की आमदनी के राजनीतिक हिस्सेदार भी बन गये हैं।

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