कार्बन का इस्तेमाल अब दिमाग के इलाज में भी होगा

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  • वैज्ञानिकों ने ग्रेफाइन के इस्तेमाल की नई तकनीक खोजी

  • बहुत मजबूत लेकिन हल्का है यह

  • लचीले उपकरण बनाने में इस्तेमाल

  • दिमागी तरंगों को सही सही पकड़ता है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः कार्बन का सबसे आधुनिक और परिष्कृत स्वरुप है ग्रेफाइन।

यह बहुत ही मजबूत लेकिन वजन में बहुत हल्का होता है।

वर्ष 2004 में जब से इसकी खोज की गई है तब से यह वैज्ञानिकों के कई किस्म के कामों में इस्तेमाल हो रहा है।

इस बार इसके एक नए इस्तेमाल की विधि पर वैज्ञानिकों ने सफलता हासिल की है।

इसके प्रयोग से दिमाग में होने वाली एक और सामान्य बीमारी का पता लगाने में भी मदद मिल रही है।

वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि इस आधार पर शोध को विकसित कर बीमारी के इलाज में भी इसका इस्तेमाल अच्छी तरह किया जा सकता है।

ग्रेफाइन का इस्तेमाल पहले से ही उस किस्म के विद्युतीय उपकरण बनाने में किया जाता है जो आकार में काफी लचीले हो।

इसके अलावा सौर ऊर्जा कैद करने में सक्षम सोलर सेल में भी इनका इस्तेमाल होता है।

इसके बाद नए किस्म की बैटरी ओं में भी ग्रेफाइन के इस्तेमाल से उनकी कार्यक्षमता अत्यधिक बढ़ाने में सफलता मिली है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक एंट्रॉपिक लेटरल स्क्लेरोसिस एक दिमागी बीमारी है।

अब तक इस बीमारी को प्रारंभिक चरण में पकड़ने का कोई वैसा पक्का इंतजाम नहीं था।

इस बीमारी में प्रारंभिक तौर पर मरीज के दिमागी न्यूरॉन के कण तेजी से ख़त्म होते चले जाते हैं।

इन न्यूरॉनों के खत्म होने की वजह से खोपड़ी के मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली प्रक्रिया प्रभावित होती है और जिसके परिणाम स्वरूप मरीज अपाहिज हो जाता है।

वैज्ञानिकों ने पाया है कि कार्बन का यह स्वरूप यानी ग्रेफाइन इस बीमारी की प्रारंभिक अवस्था को पकड़ सकता है।

कार्बन के इस परिष्कृत स्वरुप ने यंत्र को सही जानकारी दी

ग्रेफाइन की अपनी संरचना कुछ ऐसी है कि वह अपने इलाके के रसायनिक गतिविधियों को प्रभावित करता है।

इसके इस्तेमाल से दिमाग के अंदर में चल रही गड़बड़ियों तक अपेक्षित विद्युतीय तरंग पहुंचाए जा सकते हैं।

उसके माध्यम से दिमाग के अंदर घटित होने वाली गतिविधियों के आंकड़े वैज्ञानिकों तक वापस लौटते हैं।

इस जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया से दिमाग के अंदर किसी किस्म की न्यूरॉन की गड़बड़ी का पता चल जाता है।

आमतौर पर यह एक उम्र जनित बीमारी है।

जब इस बीमारी की जांच में ग्रेफाइन का इस्तेमाल किया गया

तो इस काम के लिए वहां लगाए जाए रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी यंत्र में मरीजों के जो संकेत वापस लौटे

वह बीमारी की पुष्टि करते थे।

इस प्रारंभिक खोज की सफलता के बाद वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि

इसके आणविक संरचना की वजह से इसके जरिए मरीज के दिमाग में अपेक्षित

और सही विद्युतीय तरंग भेज कर इस बीमारी को समाप्त भी किया जा सकता है।

वर्तमान में दिमाग के अंदर चल रही गतिविधियों के सामान्य प्रक्रिया से अलग होने पर

उसे पकड़ने कि कोई ठोस विधि सामने नहीं है।

अब जबकि इसके माध्यम से इस बीमारी के संकेत संयंत्र पर वैज्ञानिकों को मिले हैं

तो यह उम्मीद की जा सकती है कि दिमाग के अंदर ग्रेफाइन की मदद से

बेहतर संकेत भेज कर इस रोग को जड़ से भी शायद समाप्त किया जा सकता है।

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