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एक मील ऊंची सूनामी लहर से तबाह हुआ था इलाका, देखें वीडियो


  • डायनासोरों को मारने वाले उल्कापिंड के बारे में नई जानकारी

  • बाद में भी कई और बड़ी लहरें उठी थी

  • आसमान पर छा गये थे धुआं के बादल

  • जीवन की गाड़ी उसके बाद से बदलती गयी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः एक मील ऊंची सूनामी की पहली लहर के बाद लगातार एक के बाद एक झटके आये

थे। जी हां डायनासोर जिस उल्कापिंड के टकराने की वजह से पृथ्वी से विलुप्त हो गये,

उसके बारे में अब यह नई जानकारी मिली है। करीब 66 मिलियन वर्ष पूर्व जब यह

उल्कापिंड धरती से आ टकराया, उस काल के बारे में यह भी अनुमान है कि डायनासोरों के

खात्म का दौर उससे पहले ही प्रारंभ हो चुका थी। उल्कापिंड के टकराने से फैली भीषण

आग की वजह से बची खुची प्रजाति भी जलकर राख हो गयी। जो थोड़े बहुत डायनासोर

उस दौर में किसी तरह बच गये होंगे, प्राकृतिक बदलाव की वजह से वे भी जिंदा नहीं बच

पाये।

वीडियो में समझिये उस दौर के घटनाक्रमों को

अब वैज्ञानिक शोध में पता चला है कि उल्कापिंड के टकराने से जो झटका धरती के

अंदर पैदा हुआ था, उससे मेगा सूनामी की लहर पैदा हुई थी। यह लहर करीब एक मील

ऊंची थी। इतनी अधिक ऊंचाई वाले लहर की वजह से मिट्टी में बहुत दूर तक पानी फैल

गया था और तेज लहर से सब कुछ तबाह हो गया था। समुद्री तट के उस दौर के आकार के

आधार पर शोधकर्ताओं ने इस एक मील ऊंची सूनामी के साक्ष्य भी तलाशे हैं। माना जाता

है कि यह धरती से आ टकराने वाला यह उल्कापिंड उत्तरी अमेरिका के वर्तमान इलाके का

भूगोल ही बदल गया था। लुइसिनिया के समुद्री तट के आस पास हुए शोध में इस मेगा

सूनामी के साक्ष्य मिले हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस विशाल लहर के बाद भी धरती के

अंदर उत्पन्न कंपन की वजह से लगातार कई और सूनामी की लहरें उठी, जो करीब पचास

फीट ऊंची थी। धरती के ऊपर और धरती के अंदर इसके साक्ष्य वैज्ञानिकों ने खोज निकाले

हैं और यह नतीजा जाहिर किया है।

एक मील ऊंची सूनामी के साथ साथ हजार किलोमीटर में आग

एक मील ऊंची सूनामी की वजह से जो भौगोलिक बदलाव हुए थे, उसके बाद भी पृथ्वी पर

मौसम के बदलाव का क्रम प्रारंभ हो गया था। वैज्ञानिक अनुमान है कि सूनामी की लहर

और बाद के घटनाक्रमों की वजह से पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति में जबर्दस्त बदलाव हुआ

और यहां जीवन का चक्र भी बदल गया। दरअसल एक तेल खनन कंपनी के शोध के दौरान

जब जमीन के पांच हजार फीट नीचे से मिट्टी के नमूने बाहर निकले तो वैज्ञानिकों को

उसमें फॉसिल की शक्ल ले चुके वे पत्थर भी नजर आये, जो सूनामी के संकेत को स्पष्ट

करते थे। इसी आधार पर शोध को आगे बढ़ाया गया। वैसे पृथ्वी के अन्य इलाकों पर भी

इस उल्कापिंड के गिरने का प्रभाव पड़ा था, उसकी पुष्टि पहले ही हो चुकी है। वैसे इस शोध

के साथ ही यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि इस उल्कापिंड के गिरने के पहले से

ही किसी वजह से डायनासोरों के मरने का सिलसिला प्रारंभ हो गया था। उल्कापिंड से

फैली आग से बचा खुचा जीवन भी समाप्त हो गया था। उल्कापिंड के गिरने के दौरान

पृथ्वी के वायुमंडल में इसके प्रवेश करने के दौरान रासायनिक प्रतिक्रिया भी हुई थी।

वायुमंडल में हुई इस रासायनिक प्रतिक्रिया की वजह से आसमान में बने शीशे की बारिश

से पृथ्वी का जलीय जीवन भी लगभग समाप्त हो गया था। मछली जैसे जीवों के गलफड़े

में शीशे के छोटे छोटे कण फंस गये थे और उनकी मौत दम घुटने की वजह से हो गयी थी।

सूरज के ढक जाने से गिर गया था तापमान

नई जानकारी यह है कि उस भीषण विस्फोट के बाद पृथ्वी के अंदर से जो धूलकण निकले

थे, वे वायुमंडल में लगी आग के धुआं के साथ मिल गये थे। इन दोनों के मिश्रण की वजह

से वायुमंडल से सूर्य किरणों का आना बंद हो गया था। सूर्य की रोशनी धरती तक नहीं

पहुंचने की वजह से तापमान गिरा था और शीतयुग की नींव पड़ी थी। उस स्थिति के

समाप्त होने के बाद ही नये सिरे से जीवन की उत्पत्ति हुई थी। दरअसल उल्कापिंड के

आस पास के करीब एक हजार किलोमीटर के इलाके में लगी आग बाद में और दूर तक

फैलती गयी थी। इसी वजह से धुआं और धूल दोनों ने मिलकर आसमान पर एक घने

कोहरे जैसी स्थिति पैदा कर दी थी। जमीन के नीचे एक मील ऊंची सूनामी की लहर से

तबाह इलाकों मे सूर्य की रोशनी के नहीं पहुंचने की वजह से भी जीवन समाप्त हो गया

था। उसके बाद शीतयुग की शुरुआत हुई थी। 

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