उषा मार्टिन पर मेहरबान कुछ अधिकारी, कोयले के बाद बिजली का भी 47 करोड़ बाकी

नियामक आयोग में है मामला, विभाग की रिपोर्ट में अन्य तथ्य, चार करोड़ का अतिरिक्त भुगतान

संवाददाता
रांची : कठौतिया कोयला खदान से निकला कोयला उषा मार्टिन के कैप्टिव पावर प्लांट को जाता था। इस कोयले की कितनी मात्रा वहां गयी, इस पर बहस की पूरी गुंजाइश है। दूसरी तरफ मामले की छान-बीन से यह तथ्य भी सामने आया है कि आदित्यपुर के प्लांट में भी बिजली के बिल को लेकर कंपनी और ऊर्जा निगम के बीच गड़बड़ है।
झारखंड ऊर्जा विकास निगम एवं उसके अधिकारियों के खिलाफ खुद उषा मार्टिन ने विद्युत नियामक आयोग में एक मामला दर्ज करा रखा है। इसमें यह बताया गया है कि उस पर बिजली संबंधी जो देनदारी दर्शायी गयी है, वह गलत है।
इसी क्रम में जो दस्तावेज वहां से उपलब्ध हुए हैं, उनके मुताबिक उषा मार्टिन पर बिजली के मद में भी 47 करोड़ रुपया बकाया है। सरकार के आला अधिकारी इस देनदारी से भी अच्छी तरह वाकिफ हैं क्योंकि उषा मार्टिन की तरफ से उनके कंपनी के सहायक वाइस प्रेसिडेंट एनके पाटोदिया ने यह मामला दर्ज कराया है।
सत्ता के गलियारे में पाटोदिया एक परिचित नाम हैं। इसलिए वरीय अधिकारियों को दस्तावेजी तथा सुनी सूचनाओं के आधार पर इस मामले की पूरी जानकारी है।
दस्तावेज बताते हैं कि 31 अक्टूबर 2014 के बिजली बिल को ही इस संदर्भ में चुनौती दी गयी है। यह बिल अप्रैल 2002 से लेकर सितंबर 2014 के बीच की अवधि का है। बकाया राशि 47 करोड़ 15 लाख 41 हजार तीन सौ 24 रुपये की है।
दूसरी तरफ ऊर्जा विभाग के दस्तावेज बिहार राज्य के समय से ही उषा मार्टिन के साथ बिजली संबंधी गड़बड़ी का उल्लेख करने से नहीं चूकते। उषा मार्टिन और बिहार राज्य बिजली बोर्ड के बीच पहला करार जून 1999 में होने की सूचना दर्ज है।

उषा मार्टिन और ऊर्जा विभाग के साथ हुआ था समझौता

इसके बाद झारखंड राज्य बिजली बोर्ड के साथ कंपनी ने वर्ष 2002 में दूसरा तथा 2004 में तीसरा अनुपूरक समझौता किया था। इस कड़ी में अंतिम समझौता 2009 में हुआ था। बिजली विभाग के लोगों के मुताबिक प्रचलित कानून के तहत ही सारे समझौते किये गये थे।
बिजली बोर्ड का आरोप है कि करार की शर्तों के खिलाफ जाकर उषा मार्टिन ने निर्धारित फ्रीक्वेंसी कम होने के बाद भी बिजली का इस्तेमाल किया। इसका माहवार आंकड़ा भी विभाग ने संबंधित पक्ष को उपलब्ध करा दिया था। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक इस क्रम में नियमों का उल्लंघन करने के बाद भी बिजली विभाग ने उसे बिजली खरीदने के एवज में 3.74 करोड़ रुपये दिये।
यह रकम जून 2003 से लेकर फरवरी 2007 के बीच की अवधि के लिये थी। इसी क्रम में ऊर्जा विभाग का स्पष्ट आरोप है कि फ्रीक्वेंसी कम होने के बाद भी उषा मार्टिन ने वर्ष 2010 से लेकर 2014 तक बिजली प्राप्त किया। जो समझौता शर्त का सीधा सीधा उल्लंघन था।
मजेदार तथ्य यह भी सामने आया है कि इस दौरान सब कुछ पता होने के बाद भी ऊर्जा विभाग की तरफ से इसे रोकने के लिए न तो कोई कार्रवाई की गयी और न ही वहां कोई ऐसा रिले उपकरण स्थापित किया गया तो फ्रीक्वेंसी के स्तर को निर्धारित कर सके।

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