आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे

आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे
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आज तो क्या कुछ किया है और क्या कुछ नहीं किया है, उसके इंम्तहान की घड़ी करीब आ रही है।

जी हां मैं चुनाव की बात कर रहा हूं।

जिसने जितना कुछ किया है, उसका ईनाम अथवा दंड मिलने का टैम करीब आ रहा है।

चुनाव में अंतिम फैसला तो वोटर को करना है।

इसलिए वोटर को अपने अपने तरीके से मनाते रहिये।

नहीं तो आंख बंद और डब्बा गुल हो जाएगा।

शायद इसी मजबूरी की वजह से अब व्यंग्य के बदले सीधे हमला की बारी है।

दोनों तरफ अब बचाकर कोई हमला नहीं कर रहे हैं।

कर रहे हैं तो सीधा हमला ताकि चोट लगे को विरोधी चित हो जाए।

लेकिन यह इंडियन पॉलिटिक्स है मेरे भाई।

यहां हर कोई रक्त बीज राक्षस जैसा है।

एक बार मरता है तो सौ बार जिंदा हो उठता है।

मार लीजिए जितना बार मारना है।

आज के दौर को समझकर महानायक भी चुपके से खिसक लिये थे

हर बार किसी न किसी बहाने किसी न किसी तरीके से मुद्दा जीवित रखने का माद्दा भी होना चाहिए।

यह माद्दा नहीं है तो कमसे कम आपको भारतीय राजनीति में तो नहीं आना चाहिए।

देखें नही अपने महानायक अमिताभ बच्चन को।

बेचारा भलामानुष समझदार निकला।

एक बार झटका खाया तो भाग निकला।

अब लोग बार बार ललचाते हैं लेकिन लालाजी होशियार हैं, किसी प्रलोभन में पड़ना ही नहीं चाहते।

दूसरी तरफ कुछ और लोग भी उनके रास्ते से राजनीति में आये और टिके रहे।

पर असलियत में वह न तो घर के हैं और ना घाट के।

हर फैसला और हर विषय पर विरोधियों का कद छोटा कर खुद को ज्यादा बड़ा साबित करना ही भारतीय राजनीति का प्रचलित सिद्धांत है।

लेकिन यह सिद्धांत भी बहुत अधिक दिनों तक काम करेगा, इसपर संदेह की पूरी गुंजाइश है।

आज तो गैंग बनाकर पछाड़ने की तैयारी हो चली है

देख नहीं रहे हैं कि अकेले नहीं भिड़ पा रहे हैं तो सबने मिलकर गैंग बना लिया है।

मिलजुलकर निपटा देंगे। अरे भाई पहले वोटर को यह भरोसा तो दिला दो कि

एक के हार जाने के बाद भी तुम एकजुट रह पाओगे।

पुराना रिकार्ड बहुत खराब है मेरे भाई।

चार महीना तक साथ नहीं चल पाते हो और चुनावी बोझ पब्लिक के माथे पर डाल देते हो।

इसी बात पर प्रसिद्ध फिल्म पाकिजा का एक गीत याद आ रहा है।

इस गीत को लिखा था कैफ भोपाली ने और उसे संगीत में ढाला था गुलाम मोहम्मद ने।

इसे स्वर दिया था लता मंगेशकर और साथियों ने।

इस फिल्म के शानदार तरीके से फिल्माया गया था।

दरअसल इस फिल्म और गीत की अहमियत भी इस फिल्म के कलाकारों की वजह से बढ़ गयी थी।

राजकुमार के सामने यह गीत प्रस्तुत करते हुए मीना कुमार नाचती हैं

और कांच के टुकड़ों नाचते हुए उनके पैर लहुलुहान हो जाते हैं।

इस गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे

तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

आप तो आँख मिलाते हुए शरमाते हैं,

आप तो दिल के धड़कने से भी डर जाते हैं

फिर भी ये ज़िद्द् है के हम ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे,

तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

प्यार करना दिल-ए-बेताब बुरा होता है सुनते आये हैं के ये ख्वाब बुरा होता है

आज इस ख़्वाब की ताबीर मगर देखेंगे

तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

जानलेवा है मुहब्बत का समा आज की रात शमा हो जयेगी जल जल के धुंआ आज की रात

आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे

तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख्म-ए-जिगर देखेंगे

आज ही फैसला मत कीजिए, तेल देखिये और तेल की धार देखिये

इसलिए आज के आज यह फैसला मत कर लेना कि कल क्या करना है।

गंगा में पानी लगातार बह रहा है। उसे बहने दीजिए।

अंतिम समय में अपने आप ही तय हो जाएगा कि पानी का बहाव किस तरफ होना चाहिए

ताकि देश के पॉलिटिक्स की खेती से अधिक उपज हो।

अलबत्ता झारखंड की बात करें तो स्वर्णरेखा से लेकर कोयल और साहिबगंज के गंगा तक पानी तो शायद उल्टा बह चला है।

अपने सरयू भइया ने ऐसी खाट खड़ी कर दी है कि लोग चाहकर भी पानी को रास्ते पर नहीं ला पा रहे हैं।

बहुत जिद्दी आदमी है अपने सरयू भइया। जब ठान लिये हैं

तो चारा घोटाला और मधु कोड़ा की तरह इस बार भी कुछ न कुछ खऱमंडल जरूर करेंगे।

इसलिए अगर पाक साफ हैं तो मस्त रहिये वरना पहले वालों की तरह अंदर जाने की तैयारी अभी से ही कर लीजिए।

पता नहीं दस्तावेजों के भीतर कौन कौन सा नाग सांप छिपा बैठा है।

जो बाहर निकलेगा तो पता नहीं किस किसको डंस लेगा।

इसलिए अपुन तो किनारे खड़ा होकर बहते पानी में तैरते तिनके को देख रहे हैं

ताकि पता चले कि तिनका तिनका जुड़ते जुड़ते क्या नतीजा निकलता है।

 

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