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अफ्रीका महाद्वीप में प्रारंभ हुआ मलेरिया की रोकथाम का नया प्रयास




  • मलेरिया के टीका का सफल अनुसंधान के बाद प्रयोग प्रारंभ

  • अफ्रीका के बच्चों का किया जाएगा टीकाकरण

  • वर्ष 2015 से मलेरिया का प्रकोप बढ़ गया है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अफ्रीका में सबसे पहले करीब साढ़े तीन लाख से अधिक बच्चों को यह टीका लगाया जाएगा।

यह मलेरिया का टीका है। इसके अनुसंधान के सफल होने के बाद उसका इस्तेमाल प्रारंभ किया गया है।

याद रहे कि दुनिया भर में हर साल मलेरिया से करीब चार लाख 35 हजार लोगों की मौत होती है।

अपने भारतवर्ष और झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में भी मलेरिया का भीषण प्रकोप रहता है।

वैज्ञानिकों ने इसी बीमारी से बचाव के लिए जिस टीका का आविष्कार किया है।

उसमें मलेरिया के विषाणुओं को रोकने की क्षमता है।

इस नये टीका के बारे में वैज्ञानिक शोध प्रबंधों में जानकारी दी गयी है।

जिसमें इस टीका की संरचना को भी स्पष्ट किया गया है।

यह दरअसल एक किस्म का प्रोटिन टीका है।

इसमें मलेरिया के सबसे अधिक क्रियाशील विषाणु पी फेल्सिपारम को रोकने की ताकत है।

यही विषाणु अफ्रीका के इलाके में मलेरिया से तबाही मचा रहा है।

इस टीका के प्रारंभिक प्रयोगों से माना गया है कि यह दस में से चार लोगों का मलेरिया से बचाव कर सकता है।

इस दवा को किसी इंजेक्शन के जरिए शरीर में प्रवेश कराया जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक इस दवा के सफल होने के बाद उसे मलावी सरकार की तरफ से अपने यहां लागू किया जा रहा है।

इसके अलावा भी अफ्रीका के केन्या और घाना में इसके टीके अभी सिर्फ बच्चों को लगाये जाएंगे।

सिर्फ बच्चों को ही यह टीका देने के संबंध में स्पष्ट कर दिया है कि

चूंकि बच्चों पर मलेरिया का हमला इन इलाकों में अधिक हो रहा है,

इसलिए बच्चों को ही प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखा गया है।

अफ्रीका के बड़ों को भारतीय देसी तकनीक अपनाने की  सलाह




पांच साल के कम उम्र के बच्चों में मलेरिया से मौत के आंकड़े काफी अधिक हैं।

अकेले अफ्रीका में हर साल करीब ढाई लाख बच्चे इसकी चपेट में आकर मर रहे हैं।

इस वजह से यह टीका सबसे पहले बच्चों को ही लगाया जाएगा।

दूसरी तरफ बड़ों को भारतीय देसी तकनीक अपनाने की सलाह दी जा रही है।

भारत में खास किस्म की दवा युक्त मच्छरदानी के इस्तेमाल से मलेरिया पर करीब 24 फीसद नियंत्रण का आंकड़ा सामने आया है।

लिहाजा अफ्रीका के इलाकों में भी बड़ो को इस भारतीय तकनीक का इस्तेमाल करने की सलाह दी गयी है।

वैसे विशेषज्ञों ने स्पष्ट कर दिया है कि अफ्रीका के बाद भारतीय मलेरिया प्रभावित इलाकों में भी मलेरिया के टीका का अभियान चलाया जाएगा।

भारत में चूंकि इससे पहले पल्स पोलिया का अभियान सफलतापूर्वक चलाया गया था।

इसलिए भारत में ऐसे टीकाकरण अभियान के संचालन में अधिक सुविधा रहेगी।

भारत की उपलब्धियों पर भी दुनिया के मलेरिया रोग विशेषज्ञ अब ध्यान दे रहे हैं।

भारत में वर्ष 2016 में मलेरिया के 1087285 मामले दर्ज किये गये थे।

जो वर्ष 2017 में घटकर 844558 रह गये।

भारत में मलेरिया नियंत्रण के कार्यक्रमों का बेहतर परिणाम

इससे समझा जा सकता है कि भारत में मलेरिया का प्रकोप नियंत्रित करने के लिए चलाये गये सरकारी कार्यक्रमों में सफलता मिली है।

वैसे भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका और मालद्वीप मलेरिया मुक्त देश हैं।

लेकिन दुनिया भर में मलेरिया का हमला बढ़ने के आंकड़ों से विश्व स्वास्थ्य संगठन चिंतित है।

वर्ष 2000 से 2015 तक मलेरिया के पीड़ितों की संख्या कम होने के बाद अचानक से इनमें उछाल आ गया है, जो वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय है।

साथ ही अनुसंधान यह भी बता रहे हैं कि मलेरिया के विषाणु अब अधिक शक्तिशाली हो गये हैं।

जिस वजह से पहले की दवाइयों का उनपर कोई असर ही नहीं हो रहा है।

अब नये टीका का प्रयोग कर मलेरिया के रोग पर चालीस प्रतिशत कमी का लक्ष्य वर्ष 2020 तक का निर्धारित किया गया है।

पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों की मलेरिया से मौत का आंकड़ा सबसे ज्यादा अफ्रीका में ही है।

लिहाजा टीकाकरण का काम वहीं से प्रारंभ किया जा रहा है।

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