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ईवीएम विवाद का भारत में अब कोई स्थायी हल निकले

ईवीएम के मुद्दे पर चुनाव आयोग और चंद्राबाबू नायडू सहित अन्य विपक्षी नेता फिर से आमने सामने हैं।

विरोधी दलों ने चुनाव आयोग के इंकार के बाद इस मुद्दे को उच्चतम न्यायालय में ले जाने की घोषणा कर दी है।

यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसमें चुनाव आयोग की तरफ से दी गयी तमाम सफाई,

इलेक्ट्रानिक्स की जानकारी रखने वालों के पल्ले नहीं पड़ती।

सामान्य समझ की बात है कि किसी भी इलेक्ट्रानिक्स के अंदर छोटा सा उपकरण

लगाकर उसे बाहर से संचालित किया जा सकता है।

सामान्य समझ के लिए हम टीवी के रिमोट को देख सकते हैं।

इसलिए बार बार इसे हैक प्रूफ बताने से तो बेहतर है कि विशेषज्ञों को उसकी संरचना बतायी जाए

और यह विश्वास दिलाया जाए कि वाकई इसके माध्यम से बाहरी स्तर से कोई गड़बड़ी नहीं की जा सकती।

पहले चरण के चुनाव में भी कई स्थानों पर ईवीएम के ठीक से काम नहीं करने की शिकायत आयी है।

लेकिन जो लोग ईवीएम के बदले फिर से मतपत्रों के इस्तेमाल की वकालत कर रहे हैं,

वे आज भी प्राचीन युग में जी रहे हैं।

जमाना इतना आगे निकल चुका है तो हमें भी अपनी चुनाव प्रक्रिया को आधुनिक बनाना ही चाहिए।

दूसरी तरफ पर्यावरण की निरंतर बिगड़ती हालत के बीच हमें अपने पेड़ों को बचाने पर भी ध्यान देना ही होगा।

अपनी आंख बंद कर हम आने वाली संकटों का समाधान तो नहीं कर सकते।

देश के अनेक इलाकों में पेड़ कटने के बाद जिस तेजी से मौसम बदल रहा है,

उसकी गंभीरता को भी समझना ही होगा।

इसलिए मतपत्रों की वकालत छोड़कर इसी प्रक्रिया को और बेहतर

और सुरक्षित करने की दिशा में काम होना ही चाहिए

जाहिर सी बात है कि अगर मशीन में गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं होती तो वीपीपैट मशीन क्यों लाया जाता।

यह मशीन सिर्फ यह दर्शाती है कि मतदाता को इस बात के लिए आश्वस्त किया जा सके कि

उसका वोट उसी प्रत्याशी को गया है, जिसे उसने वोट दिया है।

जब हम वीवीपैट को स्वीकार करते हैं तो अपने आप में यह साबित हो जाता है कि

वीपीपैट नहीं होने की स्थिति में इस इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में बाहरी हस्तक्षेप संभव है।

कई लोगों ने इस बारे में अलग अलग प्रयोग किये हैं।

इन तमाम प्रयोगों में से दिल्ली के मंत्री सौरभ भारद्वाज का प्रयोग सबसे कारगर रहा है।

लेकिन चूंकि उन्होंने अपने स्तर पर एक मॉडल पेश किया था

इसलिए उनके दावे को पूरी तरह सच नहीं माना जा सकता।

विपक्षी दलों ने ईवीएम के मुद्दे पर जो सवाल उठाये हैं,

उनका संतोषजनक उत्तर मिलना भारतीय लोकतंत्र के लिए भी जरूरी है।

विपक्ष दल सिर्फ यह मांग कर रहे हैं कि कमसे कम 50 प्रतिशत मतदान पर्चियों का

मिलान ईवीएम से कराए जाने की मांग को लेकर वे उच्चतम न्यायालय का रुख करेंगे।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने बताया कि 21 राजनीतिक दल 50 प्रतिशत

मतदान पर्चियों का मिलान ईवीएम से कराए जाने की मांग कर रहे हैं।

नायडू ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा से मुलाकात कर ईवीएम गड़बड़ी का मामला उठाया था।

कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने आरोप लगाया कि हमें नहीं लगता कि

ईवीएम में गड़बड़ी के मुद्दे के निपटारे के लिए चुनाव आयोग पर्याप्त कदम उठा रहा है।

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि

प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में पांच मतदान केन्द्र पर किसी भी मतदान पर्ची का

ईवीएम का अधिक से अधिक मिलान किया जाए।

उसने कहा था कि इससे ना केवल राजनीतिक दलों बल्कि सभी मतदाताओं को भी काफी संतुष्टि मिलेगी।

जाहिर है कि इन मुद्दों को उठाने वाले दलों को चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर पूरा भरोसा नहीं है।

हाल के दिनों में चुनाव आयोग की अपनी विश्वसनीयता इतनी तेजी से कम हुई है कि

अनेक सेवानिवृत्त प्रशासनिक एवं अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों ने राष्ट्रपति तक को पत्र लिखा है।

इसलिए सामान्य इलेक्ट्रानिक की जानकारी के आधार पर भी चुनाव आयोग की दलील गले से नहीं उतरती।

आयोग यह दलील दे सकती है कि इस मशीन का इलेक्ट्रानिक्स ढांचा (डायग्राम) सार्वजनिक

करने की स्थिति में उसे हैक करने में लोगों को आसानी होगी।

लेकिन इस किस्म के बाहरी हस्तक्षेप को रोकने का ठोस प्रबंध भी वर्तमान विज्ञान में मौजूद है।

जब आम आदमी अपने घर के टीवी के चैनलों को भी समय समय पर लॉक करना सीख सकता है

तो चुनाव आयोग के विशेषज्ञ यह काम नहीं कर पायेंगे, ऐसा सोचना भी गलत है।

इस पूरी प्रक्रिया में शर्त सिर्फ ईमानदारी और निष्पक्षता की है।

इन दोनों के कायम होने की स्थिति में कोई भी विरोधी दल किसी भी कठोर

फैसले के खिलाफ आवाज नहीं उठाता।

ऐसा यह देश टीएन शेषन के कार्यकाल में अच्छी तरह देख चुका है।

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